समकालीन हस्तक्षेप
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यह एक पीयर-रिव्यूड त्रैमासिक शोध-पत्रिका है। इसका ISSN: 2277-7857 तथा SJIF 2023 = 7.858 है।
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और
जानवर से मनुष्य होने के लिए,
प्रेम का अविष्कार जरूरी था।

और
मनुष्य से समाज होने के लिए,
विरह का निर्माण जरूरी था।

और
आप मनुष्य हो प्रेम करते हैं,
समाज होते ही-बिछुड़ना होता है।

और
ऐसी धार के बीच मैंने
जाने दिया उसे

और
मनुष्य मैं रहा नही
और समाज कभी न होने दूंगा खुद को।।

— किताबगंज
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अभी और भी लोग आएंगे
______

अभी और भी लोग आएंगे
तुम्हारी भाषा में अपना पता पूछते हुए

अभी और भी लोग आएंगे कहते हुए-
हमारे वस्त्रों के भीतर तुमने जिसे टाँग दिया
यह हम नहीं

लोग आएंगे और कविताएँ परत-दर-परत उघाड़ी जाएंगी
पंक्तियों के बीच बिच्छू की तरह छिपकर बैठी हुई तुम्हारी घृणा
पकड़ी जाएगी
ध्वनियों के चिमटे से पकड़कर उठायी जाएगी कवि की मंशा

कहानियों के पात्र कहानियों से बाहर निकल आएंगे
जो कहानी में नहीं मौजूद
वह भी आएंगे कहते हुए-
चलो इधर से हटो, यह जमीन मेरी है

अभी पहाड़ आएंगे अपने ठूँठ अर्थों को धकियाते हुए
फूल आएंगे खिलने की यातना लेकर
बाँस आएंगे गालियों में धकेल दिए जाने के विरुद्ध
जुलूस मार्च करते हुए

तुम्हारी भाषा की तलाशी ली जाएगी
गवाही ली जाएगी-
एक कहानी के लिए तुमने कितने बच्चों को मार दिया
एक टुच्ची सी कविता के लिए कितनी स्त्रियों को नंगा किया ?

अभी बहुत से लोग आएंगे नारे लगाते हुए
तुम्हें उन सबको सुनना होगा

दु:ख की छाया से नहीं रचा जा सकता दुःख
नदियों की गवाही नदियाँ देंगी
मनुष्य शब्द से बहुत बड़ा है मनुष्य

तुम्हारी कहानी के ख़िलाफ़ आएंगे कहानी के पात्र
तुम्हारी कविता के ख़िलाफ़ आएंगे कविता के दुःख
विरोध करेंगे, धरने देंगे, नारे लगाएंगे
अभी और भी बहुत से लोग आएंगे

— विहाग वैभव
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चे ग्वेरा। ❤️

चे ग्वेरा से जुड़ा एक प्रसंग। किसी फिल्म का ही एक डायलॉग है।

"आतंकवादियों की प्रेम कहानियां नहीं होतीं"

इस एक लाइन में ही दो विमर्श जन्म लेते हैं. इस सवाल के साथ कि पहले ये तय हो कि आतंकवादी कौन? भारत ने आज से करीब 21 साल पहले एक प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ के सामने पेश किया था कि पूरी दुनिया के लिए आतंकवाद की कोई एक तय परिभाषा हो।

तब से लेकर 2020 तक हर साल ही संयुक्त राष्ट्र संघ में इस बात पर बहस होती है कि आतंकवाद क्या है? और आज तक सभी देश मिलकर आतंकवाद की एक साझी परिभाषा तय नहीं कर पाए हैं. ये विलंबता इस बात की भी तस्दीक करती है कि किसी राज्य के लिए एक आदमी आतंकवादी हो सकता है तो वही आदमी दूसरे राज्य के लिए नायक भी हो सकता है. एक तरह से नायक और आतंकवादी की परिभाषाएं दोनों ही एक दूसरे के करीब हैं। आतंकवादी और नायक के बीच एक महीन सा ही पर्दा है।

ऐसा ही एक नायक था चे ग्वेरा, क्यूबा के लिए नायक, बोलिविया के लिए नायक, अर्जेंटीना के लिए नायक, लेकिन अमेरिका के लिए आतंकवादी. साम्राज्यवादियों के लिए गुरिल्ला. आज ही के दिन उस वर्सटाइल रेवोल्यूशरी चे का जन्म हुआ था।

फिलहाल एक बात जान लेते हैं कि एक ऐसा आदमी जिसे 39 साल की उम्र में ही खत्म कर दिया गया. क्रांतिकारी गुरिल्लाओं में जिस आदमी की अदब का टशन हो. जिसे हर रोज जंगल-जंगल जान बचाने के उपाय करने पड़ते हों, उस नौजवान के अंदर प्रेमी कितना बचा होगा? क्या उसकी भी कोई प्रेम कहानी हो सकती है? दरअसल चे एक लड़की से "बेइंतहा" प्यार करते थे. और वो लड़की भी चे से बेइंतहा प्यार करती थी. वैसे दो प्रेम करने वालों के साथ बेइंतहा शब्द लगाना भी गैरजरूरी ही है. एकदम अनावश्यक है. दो प्रेम करने वाले प्रेम करेंगे तो "बेइंतहा" ही करेंगे. इसके पीछे कोई जीवविज्ञान नहीं है. ये बेहद ही सहज है. उस लड़की का नाम था चिनचीना. चिनचीना अर्जेंटीना की रहने वाली थी, मूलतः चे भी अर्जेंटीना के ही रहने वाले थे. वो अलग बात है बाद में वह दक्षिण अमेरिका में क्रांति करने के उद्देश्य से क्यूबा चले गए थे. चिनचीना आर्थिक दृष्टि से बेहद धनी परिवार से थीं .और यदि उस समय लिखी किताबों पर विश्वास कर लें तो चिनचीटा की खूबसूरती पर उस समय, बड़े-बड़े अमीर परिवार के लोग भी मरते थे. लेकिन उसे चे से प्यार हुआ. चे के पक्ष में उन्हें गरीब बताकर भावुक करना मेरा उद्देश्य नहीं है. चे गरीब तो नहीं ही थे. लेकिन अमीर परिवार से भी नहीं थे. ये समझ लीजिए बीच का सा परिवार था. चे विचारों में आजाद ख्याल के आदमी थे, उल्टे-सीधे कपड़े पहनते, कई बार तो फटेहाल कपड़ों से ही चिनचीना के घर की पार्टी में पहुंच जाया करते थे. लेकिन चे की प्रेमिका चिनचीना एक रूटीन लाइफ चाहती थी, जिसमें एक सामान्य सा जीवन हो, शाम को पति घर पर लौट आता हो. ऐसा वाला जीवन.

चे ठहरे गुरिल्ला युध्दों के नायक, जंगलों के निवासी. नेचर में बदमिजाज वो भी बेहिसाब. चे पढ़ाई से डॉक्टर थे. बहुत सारी किताबें भी पढ़ीं. बाद में जब क्यूबा की क्रांति सक्सेजफुल हुई तो क्यूबा के उधोग मंत्री भी बने थे साथ ही क्यूबा की राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष भी बने. दुनियाबी नजर से देखें तो इसे चे का पीक माना जाना चाहिए. क्या नहीं था उनके पास, क्यूबा सरकार की विदेश नीति से लेकर आर्थिक नीति तय करने में भी उनकी जुबान का वजन रहता था. क्यूबियाई जनता में तो हीरोइक इमेज थी ही. लेकिन इस सब कम्फर्ट लाइफ में चे का मन ही नहीं लगा. जैसे कि एक क्रांति काफी ही न हो, जैसे एक देश की आजादी काफी ही न हो, 6 साल बाद ही चे ने क्यूबा भी छोड़ दिया. वहां की नागरिकता भी त्याग दी. ताकि दूसरे देशों में क्रांति करने वाले गुरिल्लाओं की मदद कर सकें, उन्हें लीड कर सकें, जंगल जंगल जाकर ट्रेनिंग दे सकें. एकतरह से चे ने आराम और इज्जत की जिंदगी छोड़, लानत और संघर्ष की जिंदगी चुनी. अन्य मुल्कों में क्रांति का उद्देश्य लिए इस नौजवान ने क्यूबा के उद्योग मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. क्यूबा की राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष पद का मोह छोड़ जंगलों में जाकर दोबारा से निर्वासित होकर जीना चुना.

ऐसी प्रकृति के प्रेमी से "चीनचीना" को प्रेम था. चीनचीना जो चे की आत्मा थी, प्रेमिका थी. चे और चीनचीना का मिलना एक तरह से दो ध्रुवों का मिलन था. चीनचीना चाहती थी कि चे एक स्थायी जीवन जिए तो चे चाहते थे कि वे जंगलों में निर्वासित होकर आजादी की लड़ाई लड़ें. अंततः चे ने अपनी प्रेमिका के सामने एक प्रस्ताव रखा. कि वह अपने पिता की संपत्ति छोड़ उनके साथ चली आएं, वहां से दोनों वेनेजुएला चले जाएंगे, जहां चे के दोस्त यानी अलबर्टो ग्रैनडास के साथ कोढ़ियों की बस्ती में रहेंगे, कोढ़ियों की सेवा करेंगे. जंगल में रहा जाएगा, गुरिल्लाओं को ही परिवार मानेंगे.
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लेकिन चिनचीना फिलोसॉफी में नहीं जीती थी, वह अपनी शर्तों पर अड़ी रहीं और इधर चे अपनी शर्तों पर. हुआ वही कि चिनचीना चे का साथ न दे सकीं, अगर दूसरी दृष्टि से देखा जाए तो चे भी तो चिनचीना का साथ न निभा सके. ये प्रेम कहानी एक दूसरे के मन मस्तिष्कों में हमेशा के लिए दबी रह गई.

इस कहानी को जानने समझने वालों को चे की प्रेम कहानी अधूरी लग सकती है. लेकिन अधूरी जैसी चीज इस दुनिया में है ही नहीं. अधूरापन भी किसी एक नियति की पूर्णता से ही प्राप्त होता है. चे की जिंदगी में चिनचीना का सफर उतना ही था. लेकिन यहां एक चीज देखने की है. चे अपने विचारों, लक्ष्यों के लिए हर निजी कीमत चुकाने तक गए. आराम की जिंदगी भी चुकाई, प्रेम भी चुकाया, केवल आजाद ख्यालों के लिए. प्रतिरोध के लिए, आजादी के लिए. क्रांति के लिए.

वैसे भले ही प्रेम अपने आप में क्रांति नहीं है लेकिन क्रांति का सबसे उत्तम ईंधन है. मेरा भी यही मानना है कि अगर कोई प्रेम नहीं कर सकता तो वह दुनिया की कोई क्रांति भी नहीं कर सकता... इसलिए प्रेम कहानियां सबकी होती हैं, नायकों की भी, क्रांतिकारियों की भी, आतंकवादियों की भी...
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अवसाद अथवा डिप्रेशन पर बहुत चर्चा चल रही है.

पहली बात तो जानने की यह है कि अवसाद एक बीमारी है, दिमाग में केमिकल लोचा है, जोकि कई बार व्यक्ति के आनुवांशिक जीन्स पर, उसके स्वयं के व्यक्तित्व पर और उसके बैक ग्राउंड तथा आसपास के वातावरण पर निर्भर करता है.

निश्चित रूप से इसे दवाइयों के द्वारा कंट्रोल किया जा सकता है परन्तु इसे समाप्त करने के लिए आपको स्वयं में परिवर्तन लाना पड़ेगा. आपके व्यवहार और सोच को बदलने के लिए ही विभिन्न थेरेपी भी होती हैं.

मैं पिछले 23 साल से यहाँ जर्मनी में सायको थेरेपिस्ट डॉक्टर्स के साथ काम कर रहा हूँ और मेरी बीबी रमोना सायकोसोमेटिक मेडिसिन सेन्टर में सायको थेरेपिस्ट है.

पता नहीं, व्यक्तिगत रूप से डायरेक्ट हम कितने लोगों से सम्पर्क कर पाएंगे परन्तु हमने आपस में बात करके अवसाद से बचने के लिए क्या किया जाए उसकी एक लिस्ट बनाई है.

आपके लिए उसे यहाँ दे रहा हूँ, कृपया पढ़ें और आगे बढ़ाएं तो ये जानकारियाँ उन तक पहुँच सकें जिन्हें इसकी जरुरत है. पोस्ट लम्बी होने के भय से विस्तार में सभी बातों के लॉजिक को नहीं लिखा गया है परन्तु ये सभी बातें लॉजिकल और वैज्ञानिक हैं.

1. रोज ऐसी कौन सी पाँच बातें है जिन्होंने आपको मुस्कराने का मौका दिया उन्हें अपनी डायरी में लिखिए. मतलब ये कि अपनी सोच को नकारात्मक नहीं बल्कि सकारात्मक रखिये.

2. स्पोर्ट्स करिए.

3. सेक्स करिए.

4. प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भय निर्मित करने वाली धार्मिकता का त्याग करिए.

5. अन्तर्मुखी बनाने वाले अध्यात्मवाद को त्याग कर बहिर्मुख बनाने वाले भौतिकवाद को अपनाइए.

6. सामाजिक बनिए, लोगों से सम्पर्क करिए.

7. फेसबुक पर खूब बकैती करिए. 😁

— बालेन्दु गोस्वामी
कहा जाता है की प्यार की कोई न उम्र होती है प्यार तो सिर्फ प्यार होता है, जिसमे एक दूसरे के आँखों मे तमाम उम्र के लिए खो जाने को जी करता हो, जिसे हर समय अपने दिल के करीब महसूस किया जा सके, ऐसे प्यार के अलावा भी कुछ प्यार होते है जिनकी कहानियाँ कभी अधूरी नहीं होती,
चे ग्वेरा क्यूबा का एक क्रांतिकारी जिसे 39 साल की उम्र मे ही खत्म कर दिया गया, जिसने गुरिल्ला युद्धों मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो और अमेरिकी साम्राज्यवादी देशो को धूल चटाया हो, हर रोज जिसे जंगल जंगल अपनी जान की हिफाजत करना पड़ता हो और एक गंभीर विषय पर काम करना हो, उस नौजवान के अंदर कितना प्रेम बचा होगा, यह समझ पाना बेहद कठिन है, लेकिन ऐसे दौर मे भी "चे" एक लड़की से बेइंतहा, बेहिसाब प्यार करते थे और लड़की भी उनसे ऐसे ही प्यार करती थी, लड़की का नाम चिनचिना था जो अर्जेंटीना की रहने वाली थी, कहा जाता है चिनचिना की खूबसूरती पर उस समय बड़े बड़े अमीर लोग मरते थे, लेकिन उसको प्यार चे ग्वेरा से ही हुआ !
चिनचिना बेहद अमीर घर की लड़की थी और चे ग्वेरा मध्यम परिवार से, चे विचारों के धनी थे और वे कई बार उल्टे सीधे कपडे पहनकर चिनचिना के यहाँ पार्टी मे चले जाते, लेकिन चिनचिना चाहती की बाकी लोगों की तरह उनकी सामान्य जिंदगी हो, जिसमे शाम को घर लौट आने के बाद पति से प्यार भरी बातें और परिवार की बातो वाली..
ये चीजें भी सही है लेकिन जब देश की साम्राज्यवादी व्यवस्था मे जीना मुहाल हो तो ऐसे कल्पना करना शायद चे को पसंद न था,
हालांकि चे ग्वेरा पढ़ाई से डॉक्टर थे और गुरिल्ला युद्धों मे जंगलो के निवासी, बहुत सारी किताबें भी पढ़ी थी उन्होंने...
बाद मे क्यूबाई क्रांति के सफल होने के बाद उन्हें क्यूबा मे उद्योग मंत्री का पद भी मिला, साथ ही राष्ट्रीय बैंक के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने यानि एक तरह से कह सकते है की सब चीज मिला जिसकी आवश्यकता इंसान को होती है, लेकिन फिर भी इस क्रांतिकारी का मन नहीं लगा क्योकि वो दूसरे देशो के लोगों को क्रांति के लिए तैयार करने चले गए उन्होंने अपने देश क्यूबा को भी छोड़ दिया,
ऐसी प्रकृति के प्रेमी से चिनचिना को प्रेम था, ये कह सकते है की दो अलग अलग ध्रुवो का मिलन था,
जिसमे एक तरफ चिनचिना और दूसरी तरफ चे ग्वेरा था
चिनचिना चाहती की वे एक स्थायी जीवन जिये जैसे सारे लोग जीते है,
और वही चे चाहते की जंगलो मे निर्वासित होकर आजादी की लड़ाई लड़े..
अंत मे चे प्रस्ताव रखा की पिता की सम्पति छोड़ कर उनके साथ चली आए और फिर दोनों वेनुजुएला चले जायेंगे, जँहा चे के एक दोस्त नके साथ कोढ़ियो की बस्ती मे रहेंगे और उनकी सेवा करेंगे, गुरिल्ला को ही परिवार मानेंगे और जंगलो मे रहेंगे?

लेकिन चिनचिना दर्शनशास्त्र मे नहीं जीती थी, और वो अपनी शर्तो पर अडिग रही.. और अंत मे दोनों एक दूसरे से अलग हो गए, ये प्यार की कहानी एक दूसरे के दिलों मे हमेशा के लिए दबी रह गयी "
ऐसे प्रेम को ये मत समझिए की ये ये अधूरी कहानियाँ है, क्योंकि अधूरी जैसी चीज इस दुनिया मे है ही नहीं, चे और चिनचिना का सफऱ उतना ही था और ये बेहद शानदार सफऱ था, जिसमे चे ने अपने विचारों, लक्ष्यों, को पाने के लिए अपने निजी जीवन के हर इच्छा की क़ीमत चुकाने के लिए तैयार रहे और चुकाए भी..

यकीन मानिये भले ही प्रेम अपने आप मे क्रांति नहीं है लेकिन क्रांति का एक शक्ति है जैसा मार्क्स और जेंनी के सन्दर्भ मे भी देख सकते है..
बहुत सारे ऐसे इतिहास मे चीजें है जिनमे आप देखेंगे की प्रेम और इंक़लाब साथ साथ चले है, और प्रेम कहानियाँ सभी की होती है चाहे वो गरीब हो या अमीर. नायक की भी खलनायक की भी, और जब तक सृष्टि है प्रेम की कहानियाँ अमर रहेंगी !
💖💐

— फायक अतीक किदवई
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माँ हर चीज सिलती हैं। कपड़ा भी, रिश्ते भी, ज़ख्म भी। उनकी टाँकने की जिद और तुरपाई की कला से कम पड़ते हैं मेरी कविता के शब्द।

— अनुज लुगुन
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शहर के सबसे बड़े बैंक में एक बार एक बुढ़िया आई ।
उसने मैनेजर से कहा :- “मुझे इस बैंक में कुछ रुपये जमा करने हैं”

मैनेजर ने पूछा :- कितने हैं ?

वृद्धा बोली :- होंगे कोई दस लाख ।

मैनेजर बोला :- वाह क्या बात है, आपके पास तो काफ़ी पैसा है, आप करती क्या हैं ?

वृद्धा बोली :- कुछ खास नहीं, बस शर्तें लगाती हूँ ।

मैनेजर बोला :- शर्त लगा-लगा कर आपने इतना सारा पैसा कमाया है ? कमाल है…

वृद्धा बोली :- कमाल कुछ नहीं है, बेटा, मैं अभी एक लाख रुपये की शर्त लगा सकती हूँ कि तुमने अपने सिर पर विग लगा रखा है ।

मैनेजर हँसते हुए बोला :- नहीं माताजी, मैं तो अभी जवान हूँ और विग नहीं लगाता ।

तो शर्त क्यों नहीं लगाते ? वृद्धा बोली ।

मैनेजर ने सोचा यह पागल बुढ़िया खामख्वाह ही एक लाख रुपये गँवाने पर तुली है, तो क्यों न मैं इसका फ़ायदा उठाऊँ… मुझे तो मालूम ही है कि मैं विग नहीं लगाता ।

मैनेजर एक लाख की शर्त लगाने को तैयार हो गया ।

वृद्धा बोली :- चूँकि मामला एक लाख रुपये का है, इसलिये मैं कल सुबह ठीक दस बजे अपने वकील के साथ आऊँगी और उसी के सामने शर्त का फ़ैसला होगा ।

मैनेजर ने कहा :- ठीक है, बात पक्की…

मैनेजर को रात भर नींद नहीं आई.. वह एक लाख रुपये और बुढ़िया के बारे में सोचता रहा ।

अगली सुबह ठीक दस बजे वह बुढ़िया अपने वकील के साथ मैनेजर के केबिन में पहुँची और कहा :- क्या आप तैयार हैं ?

मैनेजर ने कहा :- बिलकुल, क्यों नहीं ?

वृद्धा बोली :- लेकिन चूँकि वकील साहब भी यहाँ मौजूद हैं और बात एक लाख की है, अतः मैं तसल्ली करना चाहती हूँ कि सचमुच आप विग नहीं लगाते, इसलिये मैं अपने हाथों से आपके बाल नोचकर देखूँगी ।

मैनेजर ने पल भर सोचा और हाँ कर दी, आखिर मामला एक लाख का था ।
वृद्धा मैनेजर के नजदीक आई और मैनेजर के बाल नोचने लगी । उसी वक्त अचानक पता नहीं क्या हुआ, वकील साहब अपना माथा दीवार पर ठोंकने लगे ।

मैनेजर ने कहा :- अरे.. अरे.. वकील साहब को क्या हुआ ?

वृद्धा बोली :- कुछ नहीं, इन्हें सदमा लगा है, मैंने इनसे पाँच लाख रुपये की शर्त लगाई थी कि आज सुबह दस बजे मैं शहर के सबसे बड़े बैंक के मैनेजर के बाल नोचकर दिखा दूँगी ।
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Father's Day 2023

मेरा एक जानने वाला बंदा है, मैंने उसकी ज़ुबान से हमेशा माँ का नाम सुना है पर वो कभी अपने पिताजी का ज़िक्र नही करता।
मैं उससे कहता हूँ कि पिताजी अच्छे थे बुरे थे जैसे भी थे, कुछ तो उनकी बात करो, पूरे जीवन में क्या एक भी अच्छाई उनमें नही थी जिससे तुमने प्रेरणा ली हो।
बहरहाल बाद में पता चला माँ ने छूट देकर बिगाड़ रखा था, पिताजी तो वाक़ई बहुत अच्छे इंसान थे, पढ़ाई लिखाई न करने पर डांटते थे, पर वो उनकी एक भी बात नही सुनता था, एक दिन वो खेल-खेल में मगरमच्छ पकड़कर घर ले आया। पिताजी ने बहुत डांटा, जब बहुत सख़्ती की तो माँ के गहनें लेकर चंपत हो गया।
मैं हमेशा कहता हूँ बाप सख़्त होते है लेकिन अगर आप उनकी बात सुनोगे तो एक बेहतरीन इंसान बनोगे।

~फ़ायक
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मैं तुम्हारे हाथों को
पढ़ना चाहता हूँ-

पर
किसी मानव वैज्ञानिक की तरह नहीं
और
न ही किसी ज्योतिष की तरह-

मैं उसे
अपना पहला अक्षर पढ़ने की
कोशिश करते
बच्चे की तरह पढ़ कर
आत्मसात करना चाहता हूं।

— किताबगंज
पैरेंटिंग टिपस

मैने अपने बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण के लिये शुरू से कुछ बाते सिखाईं
1. क्लास मे सिर्फ दोस्त होते हैं कम्पटीटर नही, तुम्हारा जिनसे कम्पटीशन है उन्हे तुम जानती भी नही हो. इसलिये स्कूल लाइफ एंजॉय करो, दोस्त बनाओ उनसे कम्पटीटर वाली सोच मत करना, बडे होने के बाद यही नेटवर्क तुम्हारा एसेट होगा, बस यही याद आयेगा.
2. स्कूल मे अपने सभी दोस्तों की पढाई मे मदद करो, जो भी मदद मांगे. इस बात को मन मे मत लाना कि वो तुमसे आगे ना निकल जाय, अगर वो तुम्हारे बताने भर से तुमसे आगे निकल सकता है तो तुम्हे पीछे होने मे खुशी होनी चाहिये.
3. क्लोज फ्रेंड बनाते समय क्लासमेट के मार्क्स, फिजिक, सम्पत्ति, जाति/धर्म वगैरह पर ध्यान मत देना. क्लोज फ्रेंड उसी को बनाना जिससे तुम्हारा मन मिले, जिसके साथ तुम्हे अच्छा लगे. किसी की उपलब्धि के पीछे भागना दोस्ती नही स्लेव मेंटलिटी है.

मैने खुद अपनी लाइफ मे इन चीजो को जिया या महसूस किया है. इन सलाहो से मेरी बेटियों को एक अच्छी स्कूल लाइफ जीने मे बहुत मदद मिली.
लखनऊ मे जब बडी बेटी का हाईस्कूल मे एडमीशन कराया तो वहाँ पहले से एक टॉपर और उसेक दोस्तो का अहंकारी ग्रुप था जिससे इसे सही दोस्त चुनने मे आसानी हुई. लेकिन कुछ समय बाद जब रिजल्ट आने शुरू हुये तो स्कूल ने एक नया टॉपर देखा जो व्यवहार मे एकदम अलग था. इससे स्कूल कल्चर बदलने लगा लेकिन दोनो कल्चर मे कंफ्लिक्ट भी शुरू हुआ. अंततः सिचुयेशन ये हुई कि मेरी बेटी ने 12थ बोर्ड आते आते अपने दोस्तो (जिनको ये हेल्प करती थी) के साथ ऊपर के 4 पोजीशन कब्जा कर लिये और पुरानी टॉपर पोस्टर से ही बाहर हो गई.
सेम सिचुयेशन छोटी बेटी के साथ हुई जब यहाँ उसका 10थ मे एडमिशन कराया. यहाँ तो पढाई मे वर्णव्यवस्था टाइप कल्चर था, अच्छे स्टूडेंट का अलग ग्रुप था जो कम स्कोर वालो को निम्न वर्ण समझते थे. बेटी नई थी तो उसके लिये ये हेल्पफुल रहा दोस्त बनाने मे क्योंकि अच्छे नेचर के बच्चे सहजता से उसे दोस्त के रुप मे मिल गये. लेकिन अगले मंथली इक्जाम मे जब ये टॉपर बनी तो उच्च वर्ण की तरफ से इसे अपने ग्रुप मे शामिल होने का गौरवपूर्ण आफर आया. इसने मना कर दिया कि मै अपने दोस्तो के साथ ठीक हूँ. टीचर तक इसे समझाने आये कि तुम पढने मे अच्छी हो इसलिये तुम्हे उच्च वर्ण के साथ रहना चाहिये, इसने फिर बोल दिया कि मै अपने दोस्तों को नही छोड सकती. लिहाजा उच्च वर्ग ने इसके खिलाफ संघर्ष छेड दिया लेकिन फर्क नही पडा. ना सिर्फ बोर्ड एक्जाम मे इसने अपनी टॉपर की पोजीशन बरकरार रखी बल्कि अपने दोस्तो की मदद करके पुराने दोनो टॉपर्स को पोस्टर से बाहर कर दिया. वो स्कूल ही छोड गये फिर.
दोनो ही बच्चे इसीलिये हमेशा बैक बेंच पर बैठे क्योंकि उनके दोस्त वहाँ थे. लेकिन दोनो ने ही पीछे रहकर अपने अपने स्कूल का पूरा कल्चर बदल दिया. लेकिन सबसे बडा फायदा इन्हे हुआ कि ये एक नार्मल स्टूडेंट की तरह बडे हुये, स्कूल लाइफ खूब एंजॉय की, और इससे इनका कांफिडेंस बढता गया.

हम अपने बच्चो के मन मे लोगो के लिये जहर भरते हैं कि उन्हे सबसे प्यार करना सिखाते हैं इससे उनकी पर्सनालिटी बनती है. और यही जीवन मे उनकी सफलता ही नही उनकी खुशहाली के स्तर को भी तय करती है.

— पंडित वी.एस. पेरियार
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बदचलन औरत
--
बाजार अफवाहों से गर्म है
चर्चा है कि फिर से एक औरत
'बदचलन' हो गई है..!!!

उसके टेढ़े मेढ़े चाल चलन
मर्दों को खतरे में डाल रहे हैं
मर्दों के समाज को एक औरत से
कैसा खतरा ये तो वही जाने

लेकिन औरत के तौर तरीके
और हाव भाव पुरुषो के लिए
ऐतिहासिक रूप से रोमांच
और खोज का विषय रहे हैं

चाल चलन पर बात करने वाले
लोगो में सामाजिक चिंतक भी शामिल हैं
और औरतों के हक की लड़ाई करने वाली
वो औरतें भी शामिल हैं जिनका चरित्र हनन
मौके- मौके पर होते रहा है क्योंकि
आखिर ठहरी वो भी औरत ही
लेकिन इस बार दूसरे की बारी है

खैर वो औरत जिससे अभी बाजार गर्म है
रखना चाहती है मर्दों को चौराहे पर खड़ा
और बेचारों की टोली को भेजना चाहती है
लानत भी और फूल भी,
लानत कि जमाने हो गए सुधरे नहीं तुम
और फूल जिसकी तुम्हें सख्त जरूरत है

क्योंकि
दो लोगों के बीच का संबंध
अगर तुम्हारे फूहड़ता का विषय है
तो यकीन करो...

इस समाज को तुमसे खतरा है..!!

— अंशु कुमार
आज डॉ रेखा सिंह का निधन हो गया। वेे अन्याय और हक के लिए सदा संघर्ष करती रहीं। उनका साथ हमारे लिए एक आश्वासन था। वे जानलेवा बीमारी से लगातार लड़ रही थीं। उनके हौसले को हमने महसूस किया है।

मेरी दोस्त!
पूरे रौ में चल रही
बहस एकाएक
थम गई है
एक वेगवती नदी का
उफान ठहर गया है
तुम्हारे सारे दोस्त
चुप हो गए हैं

मेरी दोस्त!
हमारी चौहद्दी थोड़ी और
सिमट गई है
हमारी बेहदी
बेतकल्लुफी
सब कहीं लापता
हो रही हैं

हम धीरे-धीरे
अस्त होते जा रहे हैँ

अलविदा!

— आशुतोष
मुझे याद है वो लड़का
जो तुम्हारे प्रेम में था।


जिसे याद था तुम्हारे उठने और सोने का वक़्त।
तुम्हारे आने से पहले
अपना कमरा झटपट साफ किया करता था।
एक कपड़ा धुला हुआ वो अलग
बस तुमसे मिलने को रखता था।

वो लड़का रटता था किताबों-कहानियों के अलाव
जो भी था तुम्हें पसंद या नापसंद।
उस लड़के को तुम्हारा फोन नंबर
ज़ुबानी याद हुआ करता था।

एक लड़का था
जो जाता बस कॉलेज तुमसे मिलने को था।

उसमें दुनिया बचाने की ताकत न थी,
वो सीट बराबर की लिए तुम्हारे
पर बचाता जरूर था।

मुझे याद है एक लड़का
जो ये सब करता था।
याद है एक लड़का
जो मुझसे अच्छी प्रेम कविताएँ करता था।।

— किताबगंज
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देख रहे थे चारों खम्बे
छत पे बैठा एक डकैत
आस तो पहले खम्बे से थी
पर वो निकला महज बकैत

दूजा खम्बा कलम का घिस्सू
पहले की दुम का था पिस्सू
एक से चाटे एक से काटे
दो मुंह का था सांप करैत

तीजा खम्बा लिए हथौड़ा
मुंह खोलो तो पीछे दौड़ा
न्याय की लाठी जो पकड़े था
वो राजा का बना लठैत

चौथे को जिसने दी हड्डी
सिर पे पहनी उसकी चड्डी
छम छम नाचे कीर्तन गाये
बारामासा फागुन चैत

देख रहे थे चारों खम्बे
छत पे बैठा एक डकैत

— दीपक तिरुवा
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शार्क अगर इंसान हो जाएं, तो क्‍या वे छोटी मछलियों से अच्छा व्‍यवहार करेंगी ?” 'मिस्टर के' से मकान मालकिन की छोटी बेटी ने पूछा।

"ज़रूर ।" मिस्टर के ने जवाब दिया। "अगर शार्क इंसान हो जाएं, तो वे छोटी मछलियों के लिए मज़बूत बक्‍से बनवा देंगी।

उन बक्‍सों में, वे हर तरह का खाना, पौधे और छोटे जानवर रख दिया करेंगी।

वे इस बात का बराबर ध्‍यान रखेंगी, कि बक्‍सों को ताज़ा पानी मिलता रहे और मछलियों की स्‍वच्‍छता और स्वास्थ्य दुरुस्त बने रहें।

अगर कोई छोटी मछली अपना पंख घायल कर ले, तो उसकी तुरन्त मरहम पट्टी की जाएगी ताकि वो समय से पहले मरकर शार्कों के लिए असुविधा न बने।

छोटी मछलियां कभी उदास न हों, इसलिए समय-समय पर विशाल जलसे और भोज होंगे, क्योंकि प्रसन्न मछलियां उदास मछलियों से ज़्यादा स्वादिष्ट होती हैं।

उन विशाल बक्सों में स्कूल भी होंगे। जहाँ छोटी मछलियां तैरते हुए, शार्कों के मुँह में प्रवेश कर जाने की शिक्षा लेंगी।

मसलन उन्हें भूगोल पढ़ाया जाएगा, ताकि वे आस-पास विश्राम करती हुई शार्कों को जब ज़रूरी हो खोज सकें।

शिक्षा का मुख्य विषय, तो स्वाभाविक है कि छोटी मछलियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना ही होगा।

उन्हें सिखाया जाएगा कि छोटी मछली ख़ुशी - ख़ुशी ख़ुद को अर्पित कर दे, यही सबसे शानदार और सबसे सुन्दर बात है।

छोटी मछलियों को हमेशा शार्कों पर विश्वास करना चाहिए, ख़ासकर तब जब वे उनके सुनहरे भविष्य के निर्माण का वादा करें।

उन्हें बताया जाएगा, कि ये सुनहरा भविष्य तभी सुनिश्चित होगा, जब वे अनुशासन और आज्ञाकारिता सीख लेंगी।

उन्हें सभी तामसिक, भौतिक और मार्क्‍सवादी प्रवृत्तियों से बचना होगा। अगर उनमें से कोई भी इन प्रवृत्तियों की तरफ जाने का संकेत देती हो, तो वे फ़ौरन शार्कों को सूचित करें।

यदि शार्क इंसान हो जाएं, तो फिर समुद्र तल में कला भी ज़रूर मौज़ूद होगी।

हर तरफ़ जगमगाते रंगों में शार्कों के दांतों के ख़ूबसूरत चित्र होंगे। उनके मुँह और गले के चित्र खेल मैदानों जैसे होंगे, जहाँ लुढका जा सके, खेला जा सके।

समुद्र तल पर थिएटरों में नाटक दिखाए जाएंगे, जिनमें बहादुर छोटी मछलियों को उत्साह पूर्वक, शार्कों के गले के भीतर, तैर कर उतरते हुए दिखाया जाएगा।

और इन दृश्यों में संगीत इतना मादक और मधुर होगा, कि उनके स्वर छोटी मछलियों को, किसी चर्च के सपनों में ले जाएंगे और बेहद उल्लास से भरी हुई, वे शार्कों के गले में उतर जाएंगी।

वहां धर्मं भी अवश्य होगा। जो उन्हें सिखाएगा कि सच्‍चा जीवन शार्कों के पेट के अंदर से ही आरम्भ होता है।

शार्क अगर इंसान हो जाएं तो सभी छोटी मछलियां, आज की तरह एक समान नहीं रहेगी, उनमें से कुछ को पद देकर दूसरों से ऊपर कर दिया जाएगा।

कुछ बड़ी मछलियों को, छोटी मछलियां खाने तक की इजाज़त दे दी जाएगी। ये शार्कों के लिए बहुत आनन्‍ददायक होगा, क्योंकि फिर उन्हें निगलने के लिए बड़े ग्रास मिलेंगे।

छोटी मछलियों में से, जिनके पास महत्वपूर्ण पद होंगे, वे शिक्षक, अधिकारी, बक्से बनाने वाली इंजीनियर आदि बनकर, अपनी साथी मछलियों को व्यवस्थित किया करेंगी।

कुल मिला कर, समुद्र में संस्कृति तभी आ पाएगी, जब शार्क इंसान बन जायें।"

शार्क अगर इंसान हो जाएं
(कहानी : बेर्टोल्ट ब्रेख्त)
#दो_की_तीन_चाय
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हारे हुए लोग कहाँ जायेंगे ? ?
हारे हुए लोगों के लिए कौन दुनिया बसाएगा ?
उन पराजित योद्धाओं के लिए ,
तमाम शिकस्त खाए लोगों के लिए।

प्रेम में टूटे हुए लोग,
सारी जिंदगी को कहीं दांव लगाकर हारे हुए लोग
थके-हारे लोग, गुमनाम लोग

वो बूढ़े पिता जो अब अकेले रह गए हैं
वो कल्पनाओं में खोया रहने वाला बच्चा
जो परीक्षा में फेल हो गया है
वो लड़की जो तेज कदमों से घर की तरफ लौट रही है
वो बूढ़ा गुब्बारे वाला जो कांपते हाथों से पैसे गिनता है

एक असफल लेखक
मैच हार गया खिलाड़ी
इंटरव्यू से वापस लौटा युवा

और ऐसे तमाम लोग
जिन्हें पता था कि वे सफल हो सकते हैं
मगर उन्होंने असफलताओं से भरा रास्ता चुना,

वो लोग जिन्होंने
हमेशा गलत राह पर चलने का जोखिम उठाया
वो लोग जिन्होंने
गलत लोगों पर भरोसा किया
वो जिन्होंने
चोट खाई, धोखा खाया, ठोकर खाई
गिरे और धूल झाड़कर खड़े हुए
वे कहां जाएंगे ?

क्या कोई ऐसी दुनिया होगी
जहां दो हारे हुए इंसान
एक-दूसरे की हथेलियां थामे
कई पलों तक खामोश रह सकते हों
अपनी चुप्पी में तकलीफ बांटते हुए।

जिन्होंने इकारस की तरह
सूरज की तरफ उड़ान भरी
और उनके पंख पिघल गए
हारे हुए लोगों के लिए कोई जगह नहीं है
न किसी घर में, न समाज में, न किसी देश में।

क्या जो विजेता थे
वो इनसे बेहतर हैं? बेहतर थे?

नहीं, वही हारा जिसने जिंदगी की अनिश्चितता पर यकीन किया
वही जिसने अनजान रास्तों पर चलने का जोखिम उठाया
जिसने गलती करनी चाही, जो मक्कार चुप्पियों के पीछे छिपा नहीं।
जो बोल सकता था मगर बोला नहीं

उसने वो चुना जिसे चुनने का कोई तर्क नहीं था
सिवाय उसकी आत्मा के
जो हारा आखिर वो भी एक नायक था।

एक पराजित नायक के दर्द को
कौन समझना चाहेगा?

जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम।

— दिनेश श्रीनेत
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धर्म या अधर्म?

मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश!
बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश!!

बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान!
पत्थर के भगवान हैं, पत्थर दिल इंसान!!

पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग!
मर जाते फुटपाथ पर, भूखे, प्यासे लोग!!

फैला है पाखंड का, अन्धकार सब ओर!
पापी करते जागरण, मचा-मचा कर शोर!

पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप!
भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप!!

— अज्ञात
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हमारे पास गर्व करने के लिए
कुछ नहीं था
इसलिए हमने अपनी गाड़ियों के पीछे
अपनी जाति लिखवा ली
कभी लिखवाया राजपूत
कभी ब्राह्मण , कभी क्षत्रिय
कभी जाट कभी मिर्ज़ा कभी कुछ

हमारे पास गर्व करने के लिए
न अच्छी शिक्षा थी ना अच्छा स्वास्थ
हम कभी सामने वाले को
नीचा दिखाए बिना बात तक नहीं कर पाते थे

हमारा स्वास्थ ऐसा था गुटका चबा चबा के
कि पांच किलोमीटर भी दौड़ नहीं सकते थे
सस्ती सिगरेट पी पी के हमारे फेफड़े
मिल में लगी हुई चिमनी बन चुके थे
हमने सालों से अच्छा स्वाद्थवर्धक खाना नहीं खाया था
क्योंकि वो बहुत महंगा था
हम भूखे थे और जो थोड़ा बहुत पैसा हमारे पास था
उसे हम बहुत ज़्यादा दिखा के
गाड़ी के पीछे अपनी जात लिखा के
घुमा करते थे
हमारे पास गर्व करने के लिए कुछ नहीं था

हमने न ढंग से प्यार किया था
न ढंग से अलगाव सहा था
इसलिए हम लाल टीका दल जैसे दलों में शामिल हो जाते थे
और सड़को पर प्यार करने वालों को हड़काते थे

हम तार्किकता से दूर थे
अंध धार्मिकता के करीब
विज्ञान से कोई वास्ता नहीं था
जो टुच्चा नेता हमे जैसे नचाता था
हम नाचते थे
हम दंगों में तलवार थे
चुनाव में वोट
और बाकी वक्त इग्नोर की जाने वाली भीड़

हमें सभ्यता के बारे में कुछ नहीं मालूम था
न संस्कृति समझते थे
हमने आज तक कोई ढंग की किताब नहीं पढ़ी थी
पर हम सबसे ज्यादा संस्कृति की दुहाई देते थे
और सभ्यता के नारे लगाते थे
हम वो थे जो एक साथ भगत सिंह की भी जय बोलते थे
और नाथूराम की भी
हमे तो ये तक नहीं पता था
कि भगत सिंह कितना बड़ा लेखक था
वो नास्तिक था और फांसी पर जाने से पहले
कम्युनिस्ट नेता लेनिन की जीवनी पढ़ रहा था

हमने अपनी कल्पनाओं से अपने भगवानों को गढ़ा था
और अपनी समझ के अनुरूप अपने भगवानों को
अपने बराबर बौना मान लिया था

हमारे पास गर्व करने को कुछ नहीं था
इसलिए हमने अपनी गाड़ियों के पीछे
अपनी जाति लिखवा ली

— मानस भारद्वाज
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मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों

जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन

वहाँ तो कतई नही
जहाँ की सड़कों पर
मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान
और दुकानें हों बड़ी-बड़ी

उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह
और शाम पिछवाडे से जहाँ
पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे ।

मत चुनना ऐसा वर
जो पोचाई[1] और हंडिया में
डूबा रहता हो अक्सर

काहिल निकम्मा हो
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर
जो बात-बात में बात करे लाठी-डंडे की
कोई थारी लोटा तो नहीं
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर

जो बात-बात में
बात करे लाठी-डंडे की
निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
जब चाहे चला जाए बंगाल, आसाम, कश्मीर
ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया
फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नही उठाया

और तो और
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो "ह" से हाथ
उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ
महुआ का लट और खजूर का गुड़
ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल

मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप.....

महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा[2], बरबट्टी[3],
समय-समय पर गोगो के लिए भी
मेला हाट जाते-जाते
मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे

उस देश ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे!

— निर्मला पुतुल
3🕊2