मैं तुम्हारे हाथों को
पढ़ना चाहता हूँ-
पर
किसी मानव वैज्ञानिक की तरह नहीं
और
न ही किसी ज्योतिष की तरह-
मैं उसे
अपना पहला अक्षर पढ़ने की
कोशिश करते
बच्चे की तरह पढ़ कर
आत्मसात करना चाहता हूं।
— किताबगंज
पढ़ना चाहता हूँ-
पर
किसी मानव वैज्ञानिक की तरह नहीं
और
न ही किसी ज्योतिष की तरह-
मैं उसे
अपना पहला अक्षर पढ़ने की
कोशिश करते
बच्चे की तरह पढ़ कर
आत्मसात करना चाहता हूं।
— किताबगंज
पैरेंटिंग टिपस
मैने अपने बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण के लिये शुरू से कुछ बाते सिखाईं
1. क्लास मे सिर्फ दोस्त होते हैं कम्पटीटर नही, तुम्हारा जिनसे कम्पटीशन है उन्हे तुम जानती भी नही हो. इसलिये स्कूल लाइफ एंजॉय करो, दोस्त बनाओ उनसे कम्पटीटर वाली सोच मत करना, बडे होने के बाद यही नेटवर्क तुम्हारा एसेट होगा, बस यही याद आयेगा.
2. स्कूल मे अपने सभी दोस्तों की पढाई मे मदद करो, जो भी मदद मांगे. इस बात को मन मे मत लाना कि वो तुमसे आगे ना निकल जाय, अगर वो तुम्हारे बताने भर से तुमसे आगे निकल सकता है तो तुम्हे पीछे होने मे खुशी होनी चाहिये.
3. क्लोज फ्रेंड बनाते समय क्लासमेट के मार्क्स, फिजिक, सम्पत्ति, जाति/धर्म वगैरह पर ध्यान मत देना. क्लोज फ्रेंड उसी को बनाना जिससे तुम्हारा मन मिले, जिसके साथ तुम्हे अच्छा लगे. किसी की उपलब्धि के पीछे भागना दोस्ती नही स्लेव मेंटलिटी है.
मैने खुद अपनी लाइफ मे इन चीजो को जिया या महसूस किया है. इन सलाहो से मेरी बेटियों को एक अच्छी स्कूल लाइफ जीने मे बहुत मदद मिली.
लखनऊ मे जब बडी बेटी का हाईस्कूल मे एडमीशन कराया तो वहाँ पहले से एक टॉपर और उसेक दोस्तो का अहंकारी ग्रुप था जिससे इसे सही दोस्त चुनने मे आसानी हुई. लेकिन कुछ समय बाद जब रिजल्ट आने शुरू हुये तो स्कूल ने एक नया टॉपर देखा जो व्यवहार मे एकदम अलग था. इससे स्कूल कल्चर बदलने लगा लेकिन दोनो कल्चर मे कंफ्लिक्ट भी शुरू हुआ. अंततः सिचुयेशन ये हुई कि मेरी बेटी ने 12थ बोर्ड आते आते अपने दोस्तो (जिनको ये हेल्प करती थी) के साथ ऊपर के 4 पोजीशन कब्जा कर लिये और पुरानी टॉपर पोस्टर से ही बाहर हो गई.
सेम सिचुयेशन छोटी बेटी के साथ हुई जब यहाँ उसका 10थ मे एडमिशन कराया. यहाँ तो पढाई मे वर्णव्यवस्था टाइप कल्चर था, अच्छे स्टूडेंट का अलग ग्रुप था जो कम स्कोर वालो को निम्न वर्ण समझते थे. बेटी नई थी तो उसके लिये ये हेल्पफुल रहा दोस्त बनाने मे क्योंकि अच्छे नेचर के बच्चे सहजता से उसे दोस्त के रुप मे मिल गये. लेकिन अगले मंथली इक्जाम मे जब ये टॉपर बनी तो उच्च वर्ण की तरफ से इसे अपने ग्रुप मे शामिल होने का गौरवपूर्ण आफर आया. इसने मना कर दिया कि मै अपने दोस्तो के साथ ठीक हूँ. टीचर तक इसे समझाने आये कि तुम पढने मे अच्छी हो इसलिये तुम्हे उच्च वर्ण के साथ रहना चाहिये, इसने फिर बोल दिया कि मै अपने दोस्तों को नही छोड सकती. लिहाजा उच्च वर्ग ने इसके खिलाफ संघर्ष छेड दिया लेकिन फर्क नही पडा. ना सिर्फ बोर्ड एक्जाम मे इसने अपनी टॉपर की पोजीशन बरकरार रखी बल्कि अपने दोस्तो की मदद करके पुराने दोनो टॉपर्स को पोस्टर से बाहर कर दिया. वो स्कूल ही छोड गये फिर.
दोनो ही बच्चे इसीलिये हमेशा बैक बेंच पर बैठे क्योंकि उनके दोस्त वहाँ थे. लेकिन दोनो ने ही पीछे रहकर अपने अपने स्कूल का पूरा कल्चर बदल दिया. लेकिन सबसे बडा फायदा इन्हे हुआ कि ये एक नार्मल स्टूडेंट की तरह बडे हुये, स्कूल लाइफ खूब एंजॉय की, और इससे इनका कांफिडेंस बढता गया.
हम अपने बच्चो के मन मे लोगो के लिये जहर भरते हैं कि उन्हे सबसे प्यार करना सिखाते हैं इससे उनकी पर्सनालिटी बनती है. और यही जीवन मे उनकी सफलता ही नही उनकी खुशहाली के स्तर को भी तय करती है.
— पंडित वी.एस. पेरियार
मैने अपने बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण के लिये शुरू से कुछ बाते सिखाईं
1. क्लास मे सिर्फ दोस्त होते हैं कम्पटीटर नही, तुम्हारा जिनसे कम्पटीशन है उन्हे तुम जानती भी नही हो. इसलिये स्कूल लाइफ एंजॉय करो, दोस्त बनाओ उनसे कम्पटीटर वाली सोच मत करना, बडे होने के बाद यही नेटवर्क तुम्हारा एसेट होगा, बस यही याद आयेगा.
2. स्कूल मे अपने सभी दोस्तों की पढाई मे मदद करो, जो भी मदद मांगे. इस बात को मन मे मत लाना कि वो तुमसे आगे ना निकल जाय, अगर वो तुम्हारे बताने भर से तुमसे आगे निकल सकता है तो तुम्हे पीछे होने मे खुशी होनी चाहिये.
3. क्लोज फ्रेंड बनाते समय क्लासमेट के मार्क्स, फिजिक, सम्पत्ति, जाति/धर्म वगैरह पर ध्यान मत देना. क्लोज फ्रेंड उसी को बनाना जिससे तुम्हारा मन मिले, जिसके साथ तुम्हे अच्छा लगे. किसी की उपलब्धि के पीछे भागना दोस्ती नही स्लेव मेंटलिटी है.
मैने खुद अपनी लाइफ मे इन चीजो को जिया या महसूस किया है. इन सलाहो से मेरी बेटियों को एक अच्छी स्कूल लाइफ जीने मे बहुत मदद मिली.
लखनऊ मे जब बडी बेटी का हाईस्कूल मे एडमीशन कराया तो वहाँ पहले से एक टॉपर और उसेक दोस्तो का अहंकारी ग्रुप था जिससे इसे सही दोस्त चुनने मे आसानी हुई. लेकिन कुछ समय बाद जब रिजल्ट आने शुरू हुये तो स्कूल ने एक नया टॉपर देखा जो व्यवहार मे एकदम अलग था. इससे स्कूल कल्चर बदलने लगा लेकिन दोनो कल्चर मे कंफ्लिक्ट भी शुरू हुआ. अंततः सिचुयेशन ये हुई कि मेरी बेटी ने 12थ बोर्ड आते आते अपने दोस्तो (जिनको ये हेल्प करती थी) के साथ ऊपर के 4 पोजीशन कब्जा कर लिये और पुरानी टॉपर पोस्टर से ही बाहर हो गई.
सेम सिचुयेशन छोटी बेटी के साथ हुई जब यहाँ उसका 10थ मे एडमिशन कराया. यहाँ तो पढाई मे वर्णव्यवस्था टाइप कल्चर था, अच्छे स्टूडेंट का अलग ग्रुप था जो कम स्कोर वालो को निम्न वर्ण समझते थे. बेटी नई थी तो उसके लिये ये हेल्पफुल रहा दोस्त बनाने मे क्योंकि अच्छे नेचर के बच्चे सहजता से उसे दोस्त के रुप मे मिल गये. लेकिन अगले मंथली इक्जाम मे जब ये टॉपर बनी तो उच्च वर्ण की तरफ से इसे अपने ग्रुप मे शामिल होने का गौरवपूर्ण आफर आया. इसने मना कर दिया कि मै अपने दोस्तो के साथ ठीक हूँ. टीचर तक इसे समझाने आये कि तुम पढने मे अच्छी हो इसलिये तुम्हे उच्च वर्ण के साथ रहना चाहिये, इसने फिर बोल दिया कि मै अपने दोस्तों को नही छोड सकती. लिहाजा उच्च वर्ग ने इसके खिलाफ संघर्ष छेड दिया लेकिन फर्क नही पडा. ना सिर्फ बोर्ड एक्जाम मे इसने अपनी टॉपर की पोजीशन बरकरार रखी बल्कि अपने दोस्तो की मदद करके पुराने दोनो टॉपर्स को पोस्टर से बाहर कर दिया. वो स्कूल ही छोड गये फिर.
दोनो ही बच्चे इसीलिये हमेशा बैक बेंच पर बैठे क्योंकि उनके दोस्त वहाँ थे. लेकिन दोनो ने ही पीछे रहकर अपने अपने स्कूल का पूरा कल्चर बदल दिया. लेकिन सबसे बडा फायदा इन्हे हुआ कि ये एक नार्मल स्टूडेंट की तरह बडे हुये, स्कूल लाइफ खूब एंजॉय की, और इससे इनका कांफिडेंस बढता गया.
हम अपने बच्चो के मन मे लोगो के लिये जहर भरते हैं कि उन्हे सबसे प्यार करना सिखाते हैं इससे उनकी पर्सनालिटी बनती है. और यही जीवन मे उनकी सफलता ही नही उनकी खुशहाली के स्तर को भी तय करती है.
— पंडित वी.एस. पेरियार
❤5👍1
बदचलन औरत
--
बाजार अफवाहों से गर्म है
चर्चा है कि फिर से एक औरत
'बदचलन' हो गई है..!!!
उसके टेढ़े मेढ़े चाल चलन
मर्दों को खतरे में डाल रहे हैं
मर्दों के समाज को एक औरत से
कैसा खतरा ये तो वही जाने
लेकिन औरत के तौर तरीके
और हाव भाव पुरुषो के लिए
ऐतिहासिक रूप से रोमांच
और खोज का विषय रहे हैं
चाल चलन पर बात करने वाले
लोगो में सामाजिक चिंतक भी शामिल हैं
और औरतों के हक की लड़ाई करने वाली
वो औरतें भी शामिल हैं जिनका चरित्र हनन
मौके- मौके पर होते रहा है क्योंकि
आखिर ठहरी वो भी औरत ही
लेकिन इस बार दूसरे की बारी है
खैर वो औरत जिससे अभी बाजार गर्म है
रखना चाहती है मर्दों को चौराहे पर खड़ा
और बेचारों की टोली को भेजना चाहती है
लानत भी और फूल भी,
लानत कि जमाने हो गए सुधरे नहीं तुम
और फूल जिसकी तुम्हें सख्त जरूरत है
क्योंकि
दो लोगों के बीच का संबंध
अगर तुम्हारे फूहड़ता का विषय है
तो यकीन करो...
इस समाज को तुमसे खतरा है..!!
— अंशु कुमार
--
बाजार अफवाहों से गर्म है
चर्चा है कि फिर से एक औरत
'बदचलन' हो गई है..!!!
उसके टेढ़े मेढ़े चाल चलन
मर्दों को खतरे में डाल रहे हैं
मर्दों के समाज को एक औरत से
कैसा खतरा ये तो वही जाने
लेकिन औरत के तौर तरीके
और हाव भाव पुरुषो के लिए
ऐतिहासिक रूप से रोमांच
और खोज का विषय रहे हैं
चाल चलन पर बात करने वाले
लोगो में सामाजिक चिंतक भी शामिल हैं
और औरतों के हक की लड़ाई करने वाली
वो औरतें भी शामिल हैं जिनका चरित्र हनन
मौके- मौके पर होते रहा है क्योंकि
आखिर ठहरी वो भी औरत ही
लेकिन इस बार दूसरे की बारी है
खैर वो औरत जिससे अभी बाजार गर्म है
रखना चाहती है मर्दों को चौराहे पर खड़ा
और बेचारों की टोली को भेजना चाहती है
लानत भी और फूल भी,
लानत कि जमाने हो गए सुधरे नहीं तुम
और फूल जिसकी तुम्हें सख्त जरूरत है
क्योंकि
दो लोगों के बीच का संबंध
अगर तुम्हारे फूहड़ता का विषय है
तो यकीन करो...
इस समाज को तुमसे खतरा है..!!
— अंशु कुमार
आज डॉ रेखा सिंह का निधन हो गया। वेे अन्याय और हक के लिए सदा संघर्ष करती रहीं। उनका साथ हमारे लिए एक आश्वासन था। वे जानलेवा बीमारी से लगातार लड़ रही थीं। उनके हौसले को हमने महसूस किया है।
मेरी दोस्त!
पूरे रौ में चल रही
बहस एकाएक
थम गई है
एक वेगवती नदी का
उफान ठहर गया है
तुम्हारे सारे दोस्त
चुप हो गए हैं
मेरी दोस्त!
हमारी चौहद्दी थोड़ी और
सिमट गई है
हमारी बेहदी
बेतकल्लुफी
सब कहीं लापता
हो रही हैं
हम धीरे-धीरे
अस्त होते जा रहे हैँ
अलविदा!
— आशुतोष
मेरी दोस्त!
पूरे रौ में चल रही
बहस एकाएक
थम गई है
एक वेगवती नदी का
उफान ठहर गया है
तुम्हारे सारे दोस्त
चुप हो गए हैं
मेरी दोस्त!
हमारी चौहद्दी थोड़ी और
सिमट गई है
हमारी बेहदी
बेतकल्लुफी
सब कहीं लापता
हो रही हैं
हम धीरे-धीरे
अस्त होते जा रहे हैँ
अलविदा!
— आशुतोष
मुझे याद है वो लड़का
जो तुम्हारे प्रेम में था।
जिसे याद था तुम्हारे उठने और सोने का वक़्त।
तुम्हारे आने से पहले
अपना कमरा झटपट साफ किया करता था।
एक कपड़ा धुला हुआ वो अलग
बस तुमसे मिलने को रखता था।
वो लड़का रटता था किताबों-कहानियों के अलाव
जो भी था तुम्हें पसंद या नापसंद।
उस लड़के को तुम्हारा फोन नंबर
ज़ुबानी याद हुआ करता था।
एक लड़का था
जो जाता बस कॉलेज तुमसे मिलने को था।
उसमें दुनिया बचाने की ताकत न थी,
वो सीट बराबर की लिए तुम्हारे
पर बचाता जरूर था।
मुझे याद है एक लड़का
जो ये सब करता था।
याद है एक लड़का
जो मुझसे अच्छी प्रेम कविताएँ करता था।।
— किताबगंज
जो तुम्हारे प्रेम में था।
जिसे याद था तुम्हारे उठने और सोने का वक़्त।
तुम्हारे आने से पहले
अपना कमरा झटपट साफ किया करता था।
एक कपड़ा धुला हुआ वो अलग
बस तुमसे मिलने को रखता था।
वो लड़का रटता था किताबों-कहानियों के अलाव
जो भी था तुम्हें पसंद या नापसंद।
उस लड़के को तुम्हारा फोन नंबर
ज़ुबानी याद हुआ करता था।
एक लड़का था
जो जाता बस कॉलेज तुमसे मिलने को था।
उसमें दुनिया बचाने की ताकत न थी,
वो सीट बराबर की लिए तुम्हारे
पर बचाता जरूर था।
मुझे याद है एक लड़का
जो ये सब करता था।
याद है एक लड़का
जो मुझसे अच्छी प्रेम कविताएँ करता था।।
— किताबगंज
❤1
देख रहे थे चारों खम्बे
छत पे बैठा एक डकैत
आस तो पहले खम्बे से थी
पर वो निकला महज बकैत
दूजा खम्बा कलम का घिस्सू
पहले की दुम का था पिस्सू
एक से चाटे एक से काटे
दो मुंह का था सांप करैत
तीजा खम्बा लिए हथौड़ा
मुंह खोलो तो पीछे दौड़ा
न्याय की लाठी जो पकड़े था
वो राजा का बना लठैत
चौथे को जिसने दी हड्डी
सिर पे पहनी उसकी चड्डी
छम छम नाचे कीर्तन गाये
बारामासा फागुन चैत
देख रहे थे चारों खम्बे
छत पे बैठा एक डकैत
— दीपक तिरुवा
छत पे बैठा एक डकैत
आस तो पहले खम्बे से थी
पर वो निकला महज बकैत
दूजा खम्बा कलम का घिस्सू
पहले की दुम का था पिस्सू
एक से चाटे एक से काटे
दो मुंह का था सांप करैत
तीजा खम्बा लिए हथौड़ा
मुंह खोलो तो पीछे दौड़ा
न्याय की लाठी जो पकड़े था
वो राजा का बना लठैत
चौथे को जिसने दी हड्डी
सिर पे पहनी उसकी चड्डी
छम छम नाचे कीर्तन गाये
बारामासा फागुन चैत
देख रहे थे चारों खम्बे
छत पे बैठा एक डकैत
— दीपक तिरुवा
👍3❤2
“शार्क अगर इंसान हो जाएं, तो क्या वे छोटी मछलियों से अच्छा व्यवहार करेंगी ?” 'मिस्टर के' से मकान मालकिन की छोटी बेटी ने पूछा।
"ज़रूर ।" मिस्टर के ने जवाब दिया। "अगर शार्क इंसान हो जाएं, तो वे छोटी मछलियों के लिए मज़बूत बक्से बनवा देंगी।
उन बक्सों में, वे हर तरह का खाना, पौधे और छोटे जानवर रख दिया करेंगी।
वे इस बात का बराबर ध्यान रखेंगी, कि बक्सों को ताज़ा पानी मिलता रहे और मछलियों की स्वच्छता और स्वास्थ्य दुरुस्त बने रहें।
अगर कोई छोटी मछली अपना पंख घायल कर ले, तो उसकी तुरन्त मरहम पट्टी की जाएगी ताकि वो समय से पहले मरकर शार्कों के लिए असुविधा न बने।
छोटी मछलियां कभी उदास न हों, इसलिए समय-समय पर विशाल जलसे और भोज होंगे, क्योंकि प्रसन्न मछलियां उदास मछलियों से ज़्यादा स्वादिष्ट होती हैं।
उन विशाल बक्सों में स्कूल भी होंगे। जहाँ छोटी मछलियां तैरते हुए, शार्कों के मुँह में प्रवेश कर जाने की शिक्षा लेंगी।
मसलन उन्हें भूगोल पढ़ाया जाएगा, ताकि वे आस-पास विश्राम करती हुई शार्कों को जब ज़रूरी हो खोज सकें।
शिक्षा का मुख्य विषय, तो स्वाभाविक है कि छोटी मछलियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना ही होगा।
उन्हें सिखाया जाएगा कि छोटी मछली ख़ुशी - ख़ुशी ख़ुद को अर्पित कर दे, यही सबसे शानदार और सबसे सुन्दर बात है।
छोटी मछलियों को हमेशा शार्कों पर विश्वास करना चाहिए, ख़ासकर तब जब वे उनके सुनहरे भविष्य के निर्माण का वादा करें।
उन्हें बताया जाएगा, कि ये सुनहरा भविष्य तभी सुनिश्चित होगा, जब वे अनुशासन और आज्ञाकारिता सीख लेंगी।
उन्हें सभी तामसिक, भौतिक और मार्क्सवादी प्रवृत्तियों से बचना होगा। अगर उनमें से कोई भी इन प्रवृत्तियों की तरफ जाने का संकेत देती हो, तो वे फ़ौरन शार्कों को सूचित करें।
यदि शार्क इंसान हो जाएं, तो फिर समुद्र तल में कला भी ज़रूर मौज़ूद होगी।
हर तरफ़ जगमगाते रंगों में शार्कों के दांतों के ख़ूबसूरत चित्र होंगे। उनके मुँह और गले के चित्र खेल मैदानों जैसे होंगे, जहाँ लुढका जा सके, खेला जा सके।
समुद्र तल पर थिएटरों में नाटक दिखाए जाएंगे, जिनमें बहादुर छोटी मछलियों को उत्साह पूर्वक, शार्कों के गले के भीतर, तैर कर उतरते हुए दिखाया जाएगा।
और इन दृश्यों में संगीत इतना मादक और मधुर होगा, कि उनके स्वर छोटी मछलियों को, किसी चर्च के सपनों में ले जाएंगे और बेहद उल्लास से भरी हुई, वे शार्कों के गले में उतर जाएंगी।
वहां धर्मं भी अवश्य होगा। जो उन्हें सिखाएगा कि सच्चा जीवन शार्कों के पेट के अंदर से ही आरम्भ होता है।
शार्क अगर इंसान हो जाएं तो सभी छोटी मछलियां, आज की तरह एक समान नहीं रहेगी, उनमें से कुछ को पद देकर दूसरों से ऊपर कर दिया जाएगा।
कुछ बड़ी मछलियों को, छोटी मछलियां खाने तक की इजाज़त दे दी जाएगी। ये शार्कों के लिए बहुत आनन्ददायक होगा, क्योंकि फिर उन्हें निगलने के लिए बड़े ग्रास मिलेंगे।
छोटी मछलियों में से, जिनके पास महत्वपूर्ण पद होंगे, वे शिक्षक, अधिकारी, बक्से बनाने वाली इंजीनियर आदि बनकर, अपनी साथी मछलियों को व्यवस्थित किया करेंगी।
कुल मिला कर, समुद्र में संस्कृति तभी आ पाएगी, जब शार्क इंसान बन जायें।"
शार्क अगर इंसान हो जाएं
(कहानी : बेर्टोल्ट ब्रेख्त)
#दो_की_तीन_चाय
"ज़रूर ।" मिस्टर के ने जवाब दिया। "अगर शार्क इंसान हो जाएं, तो वे छोटी मछलियों के लिए मज़बूत बक्से बनवा देंगी।
उन बक्सों में, वे हर तरह का खाना, पौधे और छोटे जानवर रख दिया करेंगी।
वे इस बात का बराबर ध्यान रखेंगी, कि बक्सों को ताज़ा पानी मिलता रहे और मछलियों की स्वच्छता और स्वास्थ्य दुरुस्त बने रहें।
अगर कोई छोटी मछली अपना पंख घायल कर ले, तो उसकी तुरन्त मरहम पट्टी की जाएगी ताकि वो समय से पहले मरकर शार्कों के लिए असुविधा न बने।
छोटी मछलियां कभी उदास न हों, इसलिए समय-समय पर विशाल जलसे और भोज होंगे, क्योंकि प्रसन्न मछलियां उदास मछलियों से ज़्यादा स्वादिष्ट होती हैं।
उन विशाल बक्सों में स्कूल भी होंगे। जहाँ छोटी मछलियां तैरते हुए, शार्कों के मुँह में प्रवेश कर जाने की शिक्षा लेंगी।
मसलन उन्हें भूगोल पढ़ाया जाएगा, ताकि वे आस-पास विश्राम करती हुई शार्कों को जब ज़रूरी हो खोज सकें।
शिक्षा का मुख्य विषय, तो स्वाभाविक है कि छोटी मछलियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना ही होगा।
उन्हें सिखाया जाएगा कि छोटी मछली ख़ुशी - ख़ुशी ख़ुद को अर्पित कर दे, यही सबसे शानदार और सबसे सुन्दर बात है।
छोटी मछलियों को हमेशा शार्कों पर विश्वास करना चाहिए, ख़ासकर तब जब वे उनके सुनहरे भविष्य के निर्माण का वादा करें।
उन्हें बताया जाएगा, कि ये सुनहरा भविष्य तभी सुनिश्चित होगा, जब वे अनुशासन और आज्ञाकारिता सीख लेंगी।
उन्हें सभी तामसिक, भौतिक और मार्क्सवादी प्रवृत्तियों से बचना होगा। अगर उनमें से कोई भी इन प्रवृत्तियों की तरफ जाने का संकेत देती हो, तो वे फ़ौरन शार्कों को सूचित करें।
यदि शार्क इंसान हो जाएं, तो फिर समुद्र तल में कला भी ज़रूर मौज़ूद होगी।
हर तरफ़ जगमगाते रंगों में शार्कों के दांतों के ख़ूबसूरत चित्र होंगे। उनके मुँह और गले के चित्र खेल मैदानों जैसे होंगे, जहाँ लुढका जा सके, खेला जा सके।
समुद्र तल पर थिएटरों में नाटक दिखाए जाएंगे, जिनमें बहादुर छोटी मछलियों को उत्साह पूर्वक, शार्कों के गले के भीतर, तैर कर उतरते हुए दिखाया जाएगा।
और इन दृश्यों में संगीत इतना मादक और मधुर होगा, कि उनके स्वर छोटी मछलियों को, किसी चर्च के सपनों में ले जाएंगे और बेहद उल्लास से भरी हुई, वे शार्कों के गले में उतर जाएंगी।
वहां धर्मं भी अवश्य होगा। जो उन्हें सिखाएगा कि सच्चा जीवन शार्कों के पेट के अंदर से ही आरम्भ होता है।
शार्क अगर इंसान हो जाएं तो सभी छोटी मछलियां, आज की तरह एक समान नहीं रहेगी, उनमें से कुछ को पद देकर दूसरों से ऊपर कर दिया जाएगा।
कुछ बड़ी मछलियों को, छोटी मछलियां खाने तक की इजाज़त दे दी जाएगी। ये शार्कों के लिए बहुत आनन्ददायक होगा, क्योंकि फिर उन्हें निगलने के लिए बड़े ग्रास मिलेंगे।
छोटी मछलियों में से, जिनके पास महत्वपूर्ण पद होंगे, वे शिक्षक, अधिकारी, बक्से बनाने वाली इंजीनियर आदि बनकर, अपनी साथी मछलियों को व्यवस्थित किया करेंगी।
कुल मिला कर, समुद्र में संस्कृति तभी आ पाएगी, जब शार्क इंसान बन जायें।"
शार्क अगर इंसान हो जाएं
(कहानी : बेर्टोल्ट ब्रेख्त)
#दो_की_तीन_चाय
❤5
हारे हुए लोग कहाँ जायेंगे ? ?
हारे हुए लोगों के लिए कौन दुनिया बसाएगा ?
उन पराजित योद्धाओं के लिए ,
तमाम शिकस्त खाए लोगों के लिए।
प्रेम में टूटे हुए लोग,
सारी जिंदगी को कहीं दांव लगाकर हारे हुए लोग
थके-हारे लोग, गुमनाम लोग
वो बूढ़े पिता जो अब अकेले रह गए हैं
वो कल्पनाओं में खोया रहने वाला बच्चा
जो परीक्षा में फेल हो गया है
वो लड़की जो तेज कदमों से घर की तरफ लौट रही है
वो बूढ़ा गुब्बारे वाला जो कांपते हाथों से पैसे गिनता है
एक असफल लेखक
मैच हार गया खिलाड़ी
इंटरव्यू से वापस लौटा युवा
और ऐसे तमाम लोग
जिन्हें पता था कि वे सफल हो सकते हैं
मगर उन्होंने असफलताओं से भरा रास्ता चुना,
वो लोग जिन्होंने
हमेशा गलत राह पर चलने का जोखिम उठाया
वो लोग जिन्होंने
गलत लोगों पर भरोसा किया
वो जिन्होंने
चोट खाई, धोखा खाया, ठोकर खाई
गिरे और धूल झाड़कर खड़े हुए
वे कहां जाएंगे ?
क्या कोई ऐसी दुनिया होगी
जहां दो हारे हुए इंसान
एक-दूसरे की हथेलियां थामे
कई पलों तक खामोश रह सकते हों
अपनी चुप्पी में तकलीफ बांटते हुए।
जिन्होंने इकारस की तरह
सूरज की तरफ उड़ान भरी
और उनके पंख पिघल गए
हारे हुए लोगों के लिए कोई जगह नहीं है
न किसी घर में, न समाज में, न किसी देश में।
क्या जो विजेता थे
वो इनसे बेहतर हैं? बेहतर थे?
नहीं, वही हारा जिसने जिंदगी की अनिश्चितता पर यकीन किया
वही जिसने अनजान रास्तों पर चलने का जोखिम उठाया
जिसने गलती करनी चाही, जो मक्कार चुप्पियों के पीछे छिपा नहीं।
जो बोल सकता था मगर बोला नहीं
उसने वो चुना जिसे चुनने का कोई तर्क नहीं था
सिवाय उसकी आत्मा के
जो हारा आखिर वो भी एक नायक था।
एक पराजित नायक के दर्द को
कौन समझना चाहेगा?
जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम।
— दिनेश श्रीनेत
हारे हुए लोगों के लिए कौन दुनिया बसाएगा ?
उन पराजित योद्धाओं के लिए ,
तमाम शिकस्त खाए लोगों के लिए।
प्रेम में टूटे हुए लोग,
सारी जिंदगी को कहीं दांव लगाकर हारे हुए लोग
थके-हारे लोग, गुमनाम लोग
वो बूढ़े पिता जो अब अकेले रह गए हैं
वो कल्पनाओं में खोया रहने वाला बच्चा
जो परीक्षा में फेल हो गया है
वो लड़की जो तेज कदमों से घर की तरफ लौट रही है
वो बूढ़ा गुब्बारे वाला जो कांपते हाथों से पैसे गिनता है
एक असफल लेखक
मैच हार गया खिलाड़ी
इंटरव्यू से वापस लौटा युवा
और ऐसे तमाम लोग
जिन्हें पता था कि वे सफल हो सकते हैं
मगर उन्होंने असफलताओं से भरा रास्ता चुना,
वो लोग जिन्होंने
हमेशा गलत राह पर चलने का जोखिम उठाया
वो लोग जिन्होंने
गलत लोगों पर भरोसा किया
वो जिन्होंने
चोट खाई, धोखा खाया, ठोकर खाई
गिरे और धूल झाड़कर खड़े हुए
वे कहां जाएंगे ?
क्या कोई ऐसी दुनिया होगी
जहां दो हारे हुए इंसान
एक-दूसरे की हथेलियां थामे
कई पलों तक खामोश रह सकते हों
अपनी चुप्पी में तकलीफ बांटते हुए।
जिन्होंने इकारस की तरह
सूरज की तरफ उड़ान भरी
और उनके पंख पिघल गए
हारे हुए लोगों के लिए कोई जगह नहीं है
न किसी घर में, न समाज में, न किसी देश में।
क्या जो विजेता थे
वो इनसे बेहतर हैं? बेहतर थे?
नहीं, वही हारा जिसने जिंदगी की अनिश्चितता पर यकीन किया
वही जिसने अनजान रास्तों पर चलने का जोखिम उठाया
जिसने गलती करनी चाही, जो मक्कार चुप्पियों के पीछे छिपा नहीं।
जो बोल सकता था मगर बोला नहीं
उसने वो चुना जिसे चुनने का कोई तर्क नहीं था
सिवाय उसकी आत्मा के
जो हारा आखिर वो भी एक नायक था।
एक पराजित नायक के दर्द को
कौन समझना चाहेगा?
जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम।
— दिनेश श्रीनेत
❤6
धर्म या अधर्म?
मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश!
बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश!!
बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान!
पत्थर के भगवान हैं, पत्थर दिल इंसान!!
पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग!
मर जाते फुटपाथ पर, भूखे, प्यासे लोग!!
फैला है पाखंड का, अन्धकार सब ओर!
पापी करते जागरण, मचा-मचा कर शोर!
पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप!
भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप!!
— अज्ञात
मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश!
बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश!!
बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान!
पत्थर के भगवान हैं, पत्थर दिल इंसान!!
पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग!
मर जाते फुटपाथ पर, भूखे, प्यासे लोग!!
फैला है पाखंड का, अन्धकार सब ओर!
पापी करते जागरण, मचा-मचा कर शोर!
पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप!
भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप!!
— अज्ञात
👍10❤2👏1
हमारे पास गर्व करने के लिए
कुछ नहीं था
इसलिए हमने अपनी गाड़ियों के पीछे
अपनी जाति लिखवा ली
कभी लिखवाया राजपूत
कभी ब्राह्मण , कभी क्षत्रिय
कभी जाट कभी मिर्ज़ा कभी कुछ
हमारे पास गर्व करने के लिए
न अच्छी शिक्षा थी ना अच्छा स्वास्थ
हम कभी सामने वाले को
नीचा दिखाए बिना बात तक नहीं कर पाते थे
हमारा स्वास्थ ऐसा था गुटका चबा चबा के
कि पांच किलोमीटर भी दौड़ नहीं सकते थे
सस्ती सिगरेट पी पी के हमारे फेफड़े
मिल में लगी हुई चिमनी बन चुके थे
हमने सालों से अच्छा स्वाद्थवर्धक खाना नहीं खाया था
क्योंकि वो बहुत महंगा था
हम भूखे थे और जो थोड़ा बहुत पैसा हमारे पास था
उसे हम बहुत ज़्यादा दिखा के
गाड़ी के पीछे अपनी जात लिखा के
घुमा करते थे
हमारे पास गर्व करने के लिए कुछ नहीं था
हमने न ढंग से प्यार किया था
न ढंग से अलगाव सहा था
इसलिए हम लाल टीका दल जैसे दलों में शामिल हो जाते थे
और सड़को पर प्यार करने वालों को हड़काते थे
हम तार्किकता से दूर थे
अंध धार्मिकता के करीब
विज्ञान से कोई वास्ता नहीं था
जो टुच्चा नेता हमे जैसे नचाता था
हम नाचते थे
हम दंगों में तलवार थे
चुनाव में वोट
और बाकी वक्त इग्नोर की जाने वाली भीड़
हमें सभ्यता के बारे में कुछ नहीं मालूम था
न संस्कृति समझते थे
हमने आज तक कोई ढंग की किताब नहीं पढ़ी थी
पर हम सबसे ज्यादा संस्कृति की दुहाई देते थे
और सभ्यता के नारे लगाते थे
हम वो थे जो एक साथ भगत सिंह की भी जय बोलते थे
और नाथूराम की भी
हमे तो ये तक नहीं पता था
कि भगत सिंह कितना बड़ा लेखक था
वो नास्तिक था और फांसी पर जाने से पहले
कम्युनिस्ट नेता लेनिन की जीवनी पढ़ रहा था
हमने अपनी कल्पनाओं से अपने भगवानों को गढ़ा था
और अपनी समझ के अनुरूप अपने भगवानों को
अपने बराबर बौना मान लिया था
हमारे पास गर्व करने को कुछ नहीं था
इसलिए हमने अपनी गाड़ियों के पीछे
अपनी जाति लिखवा ली
— मानस भारद्वाज
कुछ नहीं था
इसलिए हमने अपनी गाड़ियों के पीछे
अपनी जाति लिखवा ली
कभी लिखवाया राजपूत
कभी ब्राह्मण , कभी क्षत्रिय
कभी जाट कभी मिर्ज़ा कभी कुछ
हमारे पास गर्व करने के लिए
न अच्छी शिक्षा थी ना अच्छा स्वास्थ
हम कभी सामने वाले को
नीचा दिखाए बिना बात तक नहीं कर पाते थे
हमारा स्वास्थ ऐसा था गुटका चबा चबा के
कि पांच किलोमीटर भी दौड़ नहीं सकते थे
सस्ती सिगरेट पी पी के हमारे फेफड़े
मिल में लगी हुई चिमनी बन चुके थे
हमने सालों से अच्छा स्वाद्थवर्धक खाना नहीं खाया था
क्योंकि वो बहुत महंगा था
हम भूखे थे और जो थोड़ा बहुत पैसा हमारे पास था
उसे हम बहुत ज़्यादा दिखा के
गाड़ी के पीछे अपनी जात लिखा के
घुमा करते थे
हमारे पास गर्व करने के लिए कुछ नहीं था
हमने न ढंग से प्यार किया था
न ढंग से अलगाव सहा था
इसलिए हम लाल टीका दल जैसे दलों में शामिल हो जाते थे
और सड़को पर प्यार करने वालों को हड़काते थे
हम तार्किकता से दूर थे
अंध धार्मिकता के करीब
विज्ञान से कोई वास्ता नहीं था
जो टुच्चा नेता हमे जैसे नचाता था
हम नाचते थे
हम दंगों में तलवार थे
चुनाव में वोट
और बाकी वक्त इग्नोर की जाने वाली भीड़
हमें सभ्यता के बारे में कुछ नहीं मालूम था
न संस्कृति समझते थे
हमने आज तक कोई ढंग की किताब नहीं पढ़ी थी
पर हम सबसे ज्यादा संस्कृति की दुहाई देते थे
और सभ्यता के नारे लगाते थे
हम वो थे जो एक साथ भगत सिंह की भी जय बोलते थे
और नाथूराम की भी
हमे तो ये तक नहीं पता था
कि भगत सिंह कितना बड़ा लेखक था
वो नास्तिक था और फांसी पर जाने से पहले
कम्युनिस्ट नेता लेनिन की जीवनी पढ़ रहा था
हमने अपनी कल्पनाओं से अपने भगवानों को गढ़ा था
और अपनी समझ के अनुरूप अपने भगवानों को
अपने बराबर बौना मान लिया था
हमारे पास गर्व करने को कुछ नहीं था
इसलिए हमने अपनी गाड़ियों के पीछे
अपनी जाति लिखवा ली
— मानस भारद्वाज
❤2👍2👎2
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे
मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों
जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन
वहाँ तो कतई नही
जहाँ की सड़कों पर
मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान
और दुकानें हों बड़ी-बड़ी
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह
और शाम पिछवाडे से जहाँ
पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे ।
मत चुनना ऐसा वर
जो पोचाई[1] और हंडिया में
डूबा रहता हो अक्सर
काहिल निकम्मा हो
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर
जो बात-बात में बात करे लाठी-डंडे की
कोई थारी लोटा तो नहीं
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर
जो बात-बात में
बात करे लाठी-डंडे की
निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
जब चाहे चला जाए बंगाल, आसाम, कश्मीर
ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया
फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नही उठाया
और तो और
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो "ह" से हाथ
उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ
महुआ का लट और खजूर का गुड़
ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल
मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप.....
महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा[2], बरबट्टी[3],
समय-समय पर गोगो के लिए भी
मेला हाट जाते-जाते
मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे
उस देश ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे!
— निर्मला पुतुल
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे
मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों
जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन
वहाँ तो कतई नही
जहाँ की सड़कों पर
मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान
और दुकानें हों बड़ी-बड़ी
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह
और शाम पिछवाडे से जहाँ
पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे ।
मत चुनना ऐसा वर
जो पोचाई[1] और हंडिया में
डूबा रहता हो अक्सर
काहिल निकम्मा हो
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर
जो बात-बात में बात करे लाठी-डंडे की
कोई थारी लोटा तो नहीं
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर
जो बात-बात में
बात करे लाठी-डंडे की
निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
जब चाहे चला जाए बंगाल, आसाम, कश्मीर
ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया
फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नही उठाया
और तो और
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो "ह" से हाथ
उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ
महुआ का लट और खजूर का गुड़
ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल
मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप.....
महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा[2], बरबट्टी[3],
समय-समय पर गोगो के लिए भी
मेला हाट जाते-जाते
मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे
उस देश ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे!
— निर्मला पुतुल
❤3🕊2
प्रेम दिवस
जब हम मिले
हमारे मध्य दोस्ती थी
जब हम बिछड़े
हमारे मध्य प्रेम था।
हम दोनों एक साथ पड़े थे
प्रेम में
किन्तु प्रेम करना
मैंने तुम्हीं से सीखा।
तुम्हें छेड़ते हुए मैं चिल्लाया -
वे लड़कियाँ कितनी सुंदर हैं
तुमने आहिस्ता से कहा -
उन लड़कों में तुम कितने सुंदर हो।
मैंने तुमसे
तुम्हें चूमने की अनुमति माँगी
जैसे माँगता है एक बच्चा
बाहर खेलने जाने की अनुमति
अपनी माँ से
तुम्हें चूमने से ठीक पहले
मैंने चूमा
अपनी माँ का माथा
मैं तुमसे तुम्हारा
वर्तमान का प्रेम चाहता था
तुम मुझसे मेरा
भविष्य का प्रेम चाहती थी
और हमारा प्रेम
कहीं भूत में रह गया
हर बार हम इसी बात पर
बात करते हैं
कि अब हमें बात करना
बंद कर देना चाहिए
तुम जब पहली बार लौटी
मेरा घर धुएँ से भरा था
तुम जब आख़िरी बार लौटोगी
मेरा घर किताबों से भरा होगा
तुम्हारे जाने और लौटने के मध्य
मेरा प्रेम तुम्हारे लिए
और भी गहरा हो गया
मैं वो सारा प्रेम
जो तुमसे न कर सका
मैंने किया है अपनी किताबों से
— अज्ञात
❣️हैप्पी_वेलेंटाइन_डे🌹
जब हम मिले
हमारे मध्य दोस्ती थी
जब हम बिछड़े
हमारे मध्य प्रेम था।
हम दोनों एक साथ पड़े थे
प्रेम में
किन्तु प्रेम करना
मैंने तुम्हीं से सीखा।
तुम्हें छेड़ते हुए मैं चिल्लाया -
वे लड़कियाँ कितनी सुंदर हैं
तुमने आहिस्ता से कहा -
उन लड़कों में तुम कितने सुंदर हो।
मैंने तुमसे
तुम्हें चूमने की अनुमति माँगी
जैसे माँगता है एक बच्चा
बाहर खेलने जाने की अनुमति
अपनी माँ से
तुम्हें चूमने से ठीक पहले
मैंने चूमा
अपनी माँ का माथा
मैं तुमसे तुम्हारा
वर्तमान का प्रेम चाहता था
तुम मुझसे मेरा
भविष्य का प्रेम चाहती थी
और हमारा प्रेम
कहीं भूत में रह गया
हर बार हम इसी बात पर
बात करते हैं
कि अब हमें बात करना
बंद कर देना चाहिए
तुम जब पहली बार लौटी
मेरा घर धुएँ से भरा था
तुम जब आख़िरी बार लौटोगी
मेरा घर किताबों से भरा होगा
तुम्हारे जाने और लौटने के मध्य
मेरा प्रेम तुम्हारे लिए
और भी गहरा हो गया
मैं वो सारा प्रेम
जो तुमसे न कर सका
मैंने किया है अपनी किताबों से
— अज्ञात
❣️हैप्पी_वेलेंटाइन_डे🌹
👍2👎1
तुम्हारे इश्क़ को लौटना था
तुम्हारे इश्क़ को लौटना था
बहुत पहले लौटना था
जैसे लौटते हैं
खोए हुए लोग खदानों से
आँगन में लौटती है जैसे चमकीली धूप
तुम्हारे इश्क़ के सारे बाज़ार ठंडे थे
बहुत पहले लौटना था
जब :
काँच के टुकड़े को आईना कहा
निगाह के दरिया को आब कहा
तब :
सदमा मुझे जो मिला
ख़ामोशी से खिले लब पर
ज़िंदगी की राह में बहुत पहले लौटना था
तुम्हारे इश्क़ के तारों को उजास भरना था
बहुत पहले लौटना था
यह बाज़ार-ए-इश्क़ के
सभी अफ़सानों का दम टूटना ही था
डाकिए से हर चिट्ठी को
तुम्हारी ओर लौटना ही था
इश्क के मौलिक प्रेम पत्रों को जलना ही था
इस तड़पन से भरे दिल का टूटना ही था
तुम्हारे इश्क़ को लौटना था
बहुत पहले लौटना था...
— अनुभूति गुप्ता
तुम्हारे इश्क़ को लौटना था
बहुत पहले लौटना था
जैसे लौटते हैं
खोए हुए लोग खदानों से
आँगन में लौटती है जैसे चमकीली धूप
तुम्हारे इश्क़ के सारे बाज़ार ठंडे थे
बहुत पहले लौटना था
जब :
काँच के टुकड़े को आईना कहा
निगाह के दरिया को आब कहा
तब :
सदमा मुझे जो मिला
ख़ामोशी से खिले लब पर
ज़िंदगी की राह में बहुत पहले लौटना था
तुम्हारे इश्क़ के तारों को उजास भरना था
बहुत पहले लौटना था
यह बाज़ार-ए-इश्क़ के
सभी अफ़सानों का दम टूटना ही था
डाकिए से हर चिट्ठी को
तुम्हारी ओर लौटना ही था
इश्क के मौलिक प्रेम पत्रों को जलना ही था
इस तड़पन से भरे दिल का टूटना ही था
तुम्हारे इश्क़ को लौटना था
बहुत पहले लौटना था...
— अनुभूति गुप्ता
❤1
मैं झुकता हूँ
दरवाज़े से बाहर जाने से पहले
अपने जूतों के तस्मे बाँधने के लिए मैं झुकता हूँ
रोटी का कौर तोड़ने और खाने के लिए
झुकता हूँ अपनी थाली पर
जेब से अचानक गिर गई क़लम या सिक्के को उठाने को
झुकता हूँ
झुकता हूँ लेकिन उस तरह नहीं
जैसे एक चापलूस की आत्मा झुकती है
किसी शक्तिशाली के सामने
जैसे लज्जित या अपमानित होकर झुकती हैं आँखें
झुकता हूँ
जैसे शब्दों को पढ़ने के लिए आँखें झुकती हैं
ताक़त और अधीनता की भाषा से बाहर भी होते हैं
शब्दों और क्रियाओं के कई अर्थ
झुकता हूँ
जैसे घुटना हमेशा पेट की तरफ़ ही मुड़ता है
यह कथन सिर्फ़ शरीर के नैसर्गिक गुणों
या अवगुणों को ही व्यक्त नहीं करता
कहावतें अर्थ से ज़्यादा अभिप्राय में निवास करती हैं।
— राजेश जोशी
दरवाज़े से बाहर जाने से पहले
अपने जूतों के तस्मे बाँधने के लिए मैं झुकता हूँ
रोटी का कौर तोड़ने और खाने के लिए
झुकता हूँ अपनी थाली पर
जेब से अचानक गिर गई क़लम या सिक्के को उठाने को
झुकता हूँ
झुकता हूँ लेकिन उस तरह नहीं
जैसे एक चापलूस की आत्मा झुकती है
किसी शक्तिशाली के सामने
जैसे लज्जित या अपमानित होकर झुकती हैं आँखें
झुकता हूँ
जैसे शब्दों को पढ़ने के लिए आँखें झुकती हैं
ताक़त और अधीनता की भाषा से बाहर भी होते हैं
शब्दों और क्रियाओं के कई अर्थ
झुकता हूँ
जैसे घुटना हमेशा पेट की तरफ़ ही मुड़ता है
यह कथन सिर्फ़ शरीर के नैसर्गिक गुणों
या अवगुणों को ही व्यक्त नहीं करता
कहावतें अर्थ से ज़्यादा अभिप्राय में निवास करती हैं।
— राजेश जोशी
👍3❤1🥰1
आपसी मनमुटाव व द्वंद को उकेरती भावपूर्ण कविता
______
मेरी छवि औरों के कहने,
से मत कभी बनाओ तुम।
बैठो पास हमारे आकर,
थोड़ा सा बतियाओ तुम।
जिसने जैसा कहा मुझे,
तुमने क्यों वैसा मान लिया।
परखे बिन ही तुमने मुझको,
कैसे इतना जान लिया।
गांठ न बांधो मन में कोई,
मन से मन का सार कहो।
होंगे जब संवाद मदिर मिट,
जायेंगे सब रार अहो।
सीधे साधे रिश्तों को अब,
इतना मत उलझाओ तुम।
लाख बुरा हो कोई लेकिन,
कुछ तो अच्छाई होगी।
छोटा-मोटा झूठ सही पर,
थोड़ी सच्चाई होगी।
सब तो अपके मन के जैसे,
यहाँ नहीं हो जायेंगे।
हम भी सबके मन के जैसे,
कभी नहीं हो पाएंगे।
हर्षित, उल्लासित हो होकर
अपना नेह लुटाओ तुम।
द्वेष दमन कर मन से अपने,
प्रेमिल पुष्प खिलाना हैं।
जीवन होगा सरल हमारा
प्रिय सबके बन जाना हैं।
दुश्मन कोई मिले तुम्हें यदि,
तो तटस्थ तुम हो जाना।
होकर के निर्भीक गलत को,
सिर्फ गलत कहते जाना।
औरों का सम्मान करो जी,
खुद का मान बढ़ाओ तुम।
— प्रीति कुशवाहा
______
मेरी छवि औरों के कहने,
से मत कभी बनाओ तुम।
बैठो पास हमारे आकर,
थोड़ा सा बतियाओ तुम।
जिसने जैसा कहा मुझे,
तुमने क्यों वैसा मान लिया।
परखे बिन ही तुमने मुझको,
कैसे इतना जान लिया।
गांठ न बांधो मन में कोई,
मन से मन का सार कहो।
होंगे जब संवाद मदिर मिट,
जायेंगे सब रार अहो।
सीधे साधे रिश्तों को अब,
इतना मत उलझाओ तुम।
लाख बुरा हो कोई लेकिन,
कुछ तो अच्छाई होगी।
छोटा-मोटा झूठ सही पर,
थोड़ी सच्चाई होगी।
सब तो अपके मन के जैसे,
यहाँ नहीं हो जायेंगे।
हम भी सबके मन के जैसे,
कभी नहीं हो पाएंगे।
हर्षित, उल्लासित हो होकर
अपना नेह लुटाओ तुम।
द्वेष दमन कर मन से अपने,
प्रेमिल पुष्प खिलाना हैं।
जीवन होगा सरल हमारा
प्रिय सबके बन जाना हैं।
दुश्मन कोई मिले तुम्हें यदि,
तो तटस्थ तुम हो जाना।
होकर के निर्भीक गलत को,
सिर्फ गलत कहते जाना।
औरों का सम्मान करो जी,
खुद का मान बढ़ाओ तुम।
— प्रीति कुशवाहा
👍2
लकीरें बहुत अजीब होती हैं।
खाल पर खिंच जाये,
...तो खून निकाल देती हैं।
और ज़मीन पर खिंच जाये,
...तो सरहद बना देती है।
– मशाल खान
एक शहीद पाकिस्तानी युवा जिसकी ईशनिंदा के आरोप में हत्या कर दी गई थी।
खाल पर खिंच जाये,
...तो खून निकाल देती हैं।
और ज़मीन पर खिंच जाये,
...तो सरहद बना देती है।
– मशाल खान
एक शहीद पाकिस्तानी युवा जिसकी ईशनिंदा के आरोप में हत्या कर दी गई थी।
👍4❤1
इराकी-अमेरिकी कवि दुन्या मिखाइल की इक्कीस कविताएं
(1)
कछुए की तरह
घूमती रहती हूं मैं
यहां से वहां
अपनी पीठ पर लादे हुए अपना घर।
(2)
दीवार पर टंगा आईना
नहीं दिखाता उनमें से किसी भी चेहरे को
जो गुज़रते हैं उसके सामने से।
(3)
मृतक
चन्द्रमा जैसे होते हैं
पीछे छोड़ कर पृथ्वी को
वे दूर निकल जाते हैं।
(4)
ओह, नन्हीं चींटियो,
कैसे आगे बढ़ती रहती हो तुम
पीछे मुड़ कर देखे बिना।
काश मैं उधार ले पाती तुम्हारे ये पांव
केवल पांच मिनटों के लिये भी!
(5)
हम सभी पत्ते हैं शरद ऋतु के
हर समय गिरने को तैयार।
(6)
मकड़ी अपना घर ख़ुद से बाहर ही बनाती है।
वह कभी भी उसे नहीं कहती निर्वासन।
(7)
मैं कबूतर नहीं हूं
कि याद रख सकूं अपने घर का रास्ता।
(8)
ठीक इसी तरह,
उन्होंने गट्ठर बनाया हमारे हरित वर्षों का
एक भूखे भेड़ की भूख मिटाने के लिये।
(9)
बेशक आप 'प्यार' शब्द को देख नहीं पायेंगे
मैंने पानी पर लिखा था उसे।
(10)
पूरा चांद
एक शून्य की तरह दिखायी देता है
जीवन गोल है
अपनी परिणति में।
(11)
दादा ने देश छोड़ा था एक सूटकेस के साथ
पिता ने ख़ाली हाथ छोड़ा
पुत्र ने छोड़ा हाथों के बिना ही।
(12)
नहीं, मैं ऊब नहीं गयी हूं तुमसे
चन्द्रमा भी तो आता ही है बिला नागा हर रोज़!
(13)
उसने अपने दर्द का चित्र बनाया :
एक रंगीन पत्थर
भीतर समुद्र की अतल गहराई में।
मछलियां गुज़रती हैं वहां से,
वे उसे छू नहीं सकतीं।
(14)
वह बिल्कुल सुरक्षित थी
अपनी मां के गर्भ की गहराइयों में।
(15)
लालटेनें रात की अहमियत जानती हैं
और वे कहीं अधिक धैर्यशील हैं
बनिस्बत सितारों के।
वे टिकी रहती हैं सुबह होने तक।
(16)
पृथ्वी इतनी साधारण है
कि आप एक आंसू या एक हंसी के साथ
उसकी क़ैफ़ियत दे सकते हैं।
पृथ्वी इतनी जटिल है
कि उसकी क़ैफ़ियत देने के लिये
आपको एक आंसू या एक हंसी की ज़रूरत पड़ सकती है।
(17)
जो संख्या देख पा रहे हैं आप
वह अनिवार्य रूप से बदल जायेगी
अगले ही पासे के साथ।
ज़िन्दगी नहीं दिखाती अपनी सारी शक़्लें
एकबारगी।
(18)
सुहाना पल समाप्त हो चुका है।
मैं एक घंटे बिता चुकी
उस पल के बारे में सोचते हुए।
(19)
तितलियां पराग कण लाती हैं
अपने नन्हें पांवों के साथ,
और उड़ जाती हैं।
फूल ऐसा नहीं कर पाते।
इसीलिये इसकी पत्तियां होती हैं स्पन्दित
और इसके मुकुट
सिक्त रहा करते हैं आंसुओं से।
(20)
हमारे कितने ही आदिवासी साथी
युद्ध में मारे गये।
कुछ स्वाभाविक मौत मर गये।
उनमें से कोई भी ख़ुशी के मारे नहीं मरा।
(21)
जनता चौक पर खड़ी वह औरत
ताम्बे से बनी है।
वह बिकाऊ नहीं है।
(अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र, 8 अप्रैल, 2018)
(1)
कछुए की तरह
घूमती रहती हूं मैं
यहां से वहां
अपनी पीठ पर लादे हुए अपना घर।
(2)
दीवार पर टंगा आईना
नहीं दिखाता उनमें से किसी भी चेहरे को
जो गुज़रते हैं उसके सामने से।
(3)
मृतक
चन्द्रमा जैसे होते हैं
पीछे छोड़ कर पृथ्वी को
वे दूर निकल जाते हैं।
(4)
ओह, नन्हीं चींटियो,
कैसे आगे बढ़ती रहती हो तुम
पीछे मुड़ कर देखे बिना।
काश मैं उधार ले पाती तुम्हारे ये पांव
केवल पांच मिनटों के लिये भी!
(5)
हम सभी पत्ते हैं शरद ऋतु के
हर समय गिरने को तैयार।
(6)
मकड़ी अपना घर ख़ुद से बाहर ही बनाती है।
वह कभी भी उसे नहीं कहती निर्वासन।
(7)
मैं कबूतर नहीं हूं
कि याद रख सकूं अपने घर का रास्ता।
(8)
ठीक इसी तरह,
उन्होंने गट्ठर बनाया हमारे हरित वर्षों का
एक भूखे भेड़ की भूख मिटाने के लिये।
(9)
बेशक आप 'प्यार' शब्द को देख नहीं पायेंगे
मैंने पानी पर लिखा था उसे।
(10)
पूरा चांद
एक शून्य की तरह दिखायी देता है
जीवन गोल है
अपनी परिणति में।
(11)
दादा ने देश छोड़ा था एक सूटकेस के साथ
पिता ने ख़ाली हाथ छोड़ा
पुत्र ने छोड़ा हाथों के बिना ही।
(12)
नहीं, मैं ऊब नहीं गयी हूं तुमसे
चन्द्रमा भी तो आता ही है बिला नागा हर रोज़!
(13)
उसने अपने दर्द का चित्र बनाया :
एक रंगीन पत्थर
भीतर समुद्र की अतल गहराई में।
मछलियां गुज़रती हैं वहां से,
वे उसे छू नहीं सकतीं।
(14)
वह बिल्कुल सुरक्षित थी
अपनी मां के गर्भ की गहराइयों में।
(15)
लालटेनें रात की अहमियत जानती हैं
और वे कहीं अधिक धैर्यशील हैं
बनिस्बत सितारों के।
वे टिकी रहती हैं सुबह होने तक।
(16)
पृथ्वी इतनी साधारण है
कि आप एक आंसू या एक हंसी के साथ
उसकी क़ैफ़ियत दे सकते हैं।
पृथ्वी इतनी जटिल है
कि उसकी क़ैफ़ियत देने के लिये
आपको एक आंसू या एक हंसी की ज़रूरत पड़ सकती है।
(17)
जो संख्या देख पा रहे हैं आप
वह अनिवार्य रूप से बदल जायेगी
अगले ही पासे के साथ।
ज़िन्दगी नहीं दिखाती अपनी सारी शक़्लें
एकबारगी।
(18)
सुहाना पल समाप्त हो चुका है।
मैं एक घंटे बिता चुकी
उस पल के बारे में सोचते हुए।
(19)
तितलियां पराग कण लाती हैं
अपने नन्हें पांवों के साथ,
और उड़ जाती हैं।
फूल ऐसा नहीं कर पाते।
इसीलिये इसकी पत्तियां होती हैं स्पन्दित
और इसके मुकुट
सिक्त रहा करते हैं आंसुओं से।
(20)
हमारे कितने ही आदिवासी साथी
युद्ध में मारे गये।
कुछ स्वाभाविक मौत मर गये।
उनमें से कोई भी ख़ुशी के मारे नहीं मरा।
(21)
जनता चौक पर खड़ी वह औरत
ताम्बे से बनी है।
वह बिकाऊ नहीं है।
(अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र, 8 अप्रैल, 2018)
राजनीति में हिस्सा न लेना भी एक प्रकार की राजनीति होती है क्योंकि जब आप दो विकल्पों, विचारों अथवा विषयों में से कभी भी और कोई भी एक विकल्प चुनते हैं तब आप राजनीति कर रहे होते हैं।
इसलिए राजनीति में हिस्सा न लेने का परिणाम केवल यही नहीं कि अयोग्य लोग हम पर शासन करते हैं बल्कि हम विषयवस्तु को अनदेखा करके खुद की हार स्वीकारते हैं तथा अयोग्य को जीताते हैं।
कोई भी सरकार, व्यक्ति जो सत्ता पर काबिज़ हो जाता है, वह अपनी जेब से कुछ नहीं देता है बल्कि इस देश में मौजूदा संसाधनों के उपयोग से हासिल पूंजी को अलग–अलग स्कीम से जनता में वितरित करते हैं।
देश की पूंजी का सही वितरण हो इसके लिए आवश्यक है एक पारदर्शी, ईमानदार तथा जवाबदेह सरकार का अन्यथा चार के चालीस और चालीस से चार सौ बीस होता रहेगा तथा जनता भ्रम में चलती रहेगी
जब कोई नेता वोट खरीदते हैं तो इसका सीधा सा कारण है कि देश के रिसोर्सेज का दुरुपयोग किया गया है और आगे भी जमकर होगा क्योंकि उसकी भरपाई चार सौ बीस करके ही सम्भव है।
अच्छे नागरिकों को वोट की क़ीमत समझनी चाहिए ताकि बुरे नेता और बुरी सरकारें पैदा न हो सके। राजनीति में नज़र रखें, यह आपकी रोज़ी, रोटी, नौकरी, पेशा, वजूद और भविष्य सब तय करती है।
— आर. पी. विशाल
इसलिए राजनीति में हिस्सा न लेने का परिणाम केवल यही नहीं कि अयोग्य लोग हम पर शासन करते हैं बल्कि हम विषयवस्तु को अनदेखा करके खुद की हार स्वीकारते हैं तथा अयोग्य को जीताते हैं।
कोई भी सरकार, व्यक्ति जो सत्ता पर काबिज़ हो जाता है, वह अपनी जेब से कुछ नहीं देता है बल्कि इस देश में मौजूदा संसाधनों के उपयोग से हासिल पूंजी को अलग–अलग स्कीम से जनता में वितरित करते हैं।
देश की पूंजी का सही वितरण हो इसके लिए आवश्यक है एक पारदर्शी, ईमानदार तथा जवाबदेह सरकार का अन्यथा चार के चालीस और चालीस से चार सौ बीस होता रहेगा तथा जनता भ्रम में चलती रहेगी
जब कोई नेता वोट खरीदते हैं तो इसका सीधा सा कारण है कि देश के रिसोर्सेज का दुरुपयोग किया गया है और आगे भी जमकर होगा क्योंकि उसकी भरपाई चार सौ बीस करके ही सम्भव है।
अच्छे नागरिकों को वोट की क़ीमत समझनी चाहिए ताकि बुरे नेता और बुरी सरकारें पैदा न हो सके। राजनीति में नज़र रखें, यह आपकी रोज़ी, रोटी, नौकरी, पेशा, वजूद और भविष्य सब तय करती है।
— आर. पी. विशाल
❤1
निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है
--------------
तुमने मेरी उंगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया था पिता
आभारी हूं, पर रास्ता मैं ही चुनूंगा अपना
तुमने शब्दों का यह विस्मयकारी संसार दिया गुरुवर
आभारी हूँ, पर लिखूंगा अपना ही सच मैं
मैं उदासियों के समय में उम्मीदें गढ़ता हूँ
और अकेला नहीं हूँ बिलकुल
शब्दों के सहारे बना रहा हूँ पुल इस उफनते महासागर में
हजारो-हज़ार हाथों में, जो एक अनचीन्हा हाथ है, वह मेरा है
हज़ारो-हज़ार पैरों में जो एक धीमा पाँव है, वह मेरा है
थकान को पराजित करती आवाजों में
एक आवाज़ मेरी भी है शामिल
और बेमक़सद कभी नहीं होती आवाजें...
निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है उसे फेंकने वाला हाथ नहीं
निष्पक्ष कागज हो सकता है कलम के लिए कहाँ मुमकिन है यह?
मैं हाड़-मांस का जीवित मनुष्य हूँ
इतिहास और भविष्य के इस पुल पर खड़ा
नहीं गुज़ार सकता अपनी उम्र
नियति है मेरी चलना
और मैं पूरी ताक़त के साथ चलता हूँ भविष्य की ओर
— अशोक कुमार पाण्डेय
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तुमने मेरी उंगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया था पिता
आभारी हूं, पर रास्ता मैं ही चुनूंगा अपना
तुमने शब्दों का यह विस्मयकारी संसार दिया गुरुवर
आभारी हूँ, पर लिखूंगा अपना ही सच मैं
मैं उदासियों के समय में उम्मीदें गढ़ता हूँ
और अकेला नहीं हूँ बिलकुल
शब्दों के सहारे बना रहा हूँ पुल इस उफनते महासागर में
हजारो-हज़ार हाथों में, जो एक अनचीन्हा हाथ है, वह मेरा है
हज़ारो-हज़ार पैरों में जो एक धीमा पाँव है, वह मेरा है
थकान को पराजित करती आवाजों में
एक आवाज़ मेरी भी है शामिल
और बेमक़सद कभी नहीं होती आवाजें...
निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है उसे फेंकने वाला हाथ नहीं
निष्पक्ष कागज हो सकता है कलम के लिए कहाँ मुमकिन है यह?
मैं हाड़-मांस का जीवित मनुष्य हूँ
इतिहास और भविष्य के इस पुल पर खड़ा
नहीं गुज़ार सकता अपनी उम्र
नियति है मेरी चलना
और मैं पूरी ताक़त के साथ चलता हूँ भविष्य की ओर
— अशोक कुमार पाण्डेय
👍5❤1
हिन्दी दिवस बीता है, लेकिन यह क़िस्सा सुन लीजिए।
कोपनहेगन में था। बारिश हो रही थी और नक़्शे में रेलवे स्टेशन पास ही कहीं दिखा रहा था पर समझ नहीं आ रहा था। एक भारतीय दिखने वाला नवयुवक दिखा। अंग्रेज़ी में पूछा, उसने अंग्रेज़ी में बताया और मुस्कुराकर पूछा- You are here for the first time?
मैंने हाँ की मुद्रा में सर हिलाकर उससे पूछा- Are you Indian? उसने मुस्कुराकर सर हिलाया तो मैंने हिन्दी में कुछ कहा। उसने अंग्रेज़ी में कहा कि मैं तमिलनाडु से हूँ और मुझे ठीक से हिन्दी नहीं आती। मैंने अंग्रेज़ी में ही उससे कहा कि मुझे तमिल तो एकदम नहीं आती। दोनों मुस्कुराये और विदा ली।
तो बस याद रखना चाहिए कि जिन्हें हिंदी नहीं आती वह भी भारतीय हैं। राष्ट्रभाषा का गर्व इस तथ्य पर राख डालने के लिए नहीं करना चाहिए।
— अशोक कुमार पाण्डेय
कोपनहेगन में था। बारिश हो रही थी और नक़्शे में रेलवे स्टेशन पास ही कहीं दिखा रहा था पर समझ नहीं आ रहा था। एक भारतीय दिखने वाला नवयुवक दिखा। अंग्रेज़ी में पूछा, उसने अंग्रेज़ी में बताया और मुस्कुराकर पूछा- You are here for the first time?
मैंने हाँ की मुद्रा में सर हिलाकर उससे पूछा- Are you Indian? उसने मुस्कुराकर सर हिलाया तो मैंने हिन्दी में कुछ कहा। उसने अंग्रेज़ी में कहा कि मैं तमिलनाडु से हूँ और मुझे ठीक से हिन्दी नहीं आती। मैंने अंग्रेज़ी में ही उससे कहा कि मुझे तमिल तो एकदम नहीं आती। दोनों मुस्कुराये और विदा ली।
तो बस याद रखना चाहिए कि जिन्हें हिंदी नहीं आती वह भी भारतीय हैं। राष्ट्रभाषा का गर्व इस तथ्य पर राख डालने के लिए नहीं करना चाहिए।
— अशोक कुमार पाण्डेय
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