राजनीति में हिस्सा न लेना भी एक प्रकार की राजनीति होती है क्योंकि जब आप दो विकल्पों, विचारों अथवा विषयों में से कभी भी और कोई भी एक विकल्प चुनते हैं तब आप राजनीति कर रहे होते हैं।
इसलिए राजनीति में हिस्सा न लेने का परिणाम केवल यही नहीं कि अयोग्य लोग हम पर शासन करते हैं बल्कि हम विषयवस्तु को अनदेखा करके खुद की हार स्वीकारते हैं तथा अयोग्य को जीताते हैं।
कोई भी सरकार, व्यक्ति जो सत्ता पर काबिज़ हो जाता है, वह अपनी जेब से कुछ नहीं देता है बल्कि इस देश में मौजूदा संसाधनों के उपयोग से हासिल पूंजी को अलग–अलग स्कीम से जनता में वितरित करते हैं।
देश की पूंजी का सही वितरण हो इसके लिए आवश्यक है एक पारदर्शी, ईमानदार तथा जवाबदेह सरकार का अन्यथा चार के चालीस और चालीस से चार सौ बीस होता रहेगा तथा जनता भ्रम में चलती रहेगी
जब कोई नेता वोट खरीदते हैं तो इसका सीधा सा कारण है कि देश के रिसोर्सेज का दुरुपयोग किया गया है और आगे भी जमकर होगा क्योंकि उसकी भरपाई चार सौ बीस करके ही सम्भव है।
अच्छे नागरिकों को वोट की क़ीमत समझनी चाहिए ताकि बुरे नेता और बुरी सरकारें पैदा न हो सके। राजनीति में नज़र रखें, यह आपकी रोज़ी, रोटी, नौकरी, पेशा, वजूद और भविष्य सब तय करती है।
— आर. पी. विशाल
इसलिए राजनीति में हिस्सा न लेने का परिणाम केवल यही नहीं कि अयोग्य लोग हम पर शासन करते हैं बल्कि हम विषयवस्तु को अनदेखा करके खुद की हार स्वीकारते हैं तथा अयोग्य को जीताते हैं।
कोई भी सरकार, व्यक्ति जो सत्ता पर काबिज़ हो जाता है, वह अपनी जेब से कुछ नहीं देता है बल्कि इस देश में मौजूदा संसाधनों के उपयोग से हासिल पूंजी को अलग–अलग स्कीम से जनता में वितरित करते हैं।
देश की पूंजी का सही वितरण हो इसके लिए आवश्यक है एक पारदर्शी, ईमानदार तथा जवाबदेह सरकार का अन्यथा चार के चालीस और चालीस से चार सौ बीस होता रहेगा तथा जनता भ्रम में चलती रहेगी
जब कोई नेता वोट खरीदते हैं तो इसका सीधा सा कारण है कि देश के रिसोर्सेज का दुरुपयोग किया गया है और आगे भी जमकर होगा क्योंकि उसकी भरपाई चार सौ बीस करके ही सम्भव है।
अच्छे नागरिकों को वोट की क़ीमत समझनी चाहिए ताकि बुरे नेता और बुरी सरकारें पैदा न हो सके। राजनीति में नज़र रखें, यह आपकी रोज़ी, रोटी, नौकरी, पेशा, वजूद और भविष्य सब तय करती है।
— आर. पी. विशाल
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निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है
--------------
तुमने मेरी उंगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया था पिता
आभारी हूं, पर रास्ता मैं ही चुनूंगा अपना
तुमने शब्दों का यह विस्मयकारी संसार दिया गुरुवर
आभारी हूँ, पर लिखूंगा अपना ही सच मैं
मैं उदासियों के समय में उम्मीदें गढ़ता हूँ
और अकेला नहीं हूँ बिलकुल
शब्दों के सहारे बना रहा हूँ पुल इस उफनते महासागर में
हजारो-हज़ार हाथों में, जो एक अनचीन्हा हाथ है, वह मेरा है
हज़ारो-हज़ार पैरों में जो एक धीमा पाँव है, वह मेरा है
थकान को पराजित करती आवाजों में
एक आवाज़ मेरी भी है शामिल
और बेमक़सद कभी नहीं होती आवाजें...
निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है उसे फेंकने वाला हाथ नहीं
निष्पक्ष कागज हो सकता है कलम के लिए कहाँ मुमकिन है यह?
मैं हाड़-मांस का जीवित मनुष्य हूँ
इतिहास और भविष्य के इस पुल पर खड़ा
नहीं गुज़ार सकता अपनी उम्र
नियति है मेरी चलना
और मैं पूरी ताक़त के साथ चलता हूँ भविष्य की ओर
— अशोक कुमार पाण्डेय
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तुमने मेरी उंगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया था पिता
आभारी हूं, पर रास्ता मैं ही चुनूंगा अपना
तुमने शब्दों का यह विस्मयकारी संसार दिया गुरुवर
आभारी हूँ, पर लिखूंगा अपना ही सच मैं
मैं उदासियों के समय में उम्मीदें गढ़ता हूँ
और अकेला नहीं हूँ बिलकुल
शब्दों के सहारे बना रहा हूँ पुल इस उफनते महासागर में
हजारो-हज़ार हाथों में, जो एक अनचीन्हा हाथ है, वह मेरा है
हज़ारो-हज़ार पैरों में जो एक धीमा पाँव है, वह मेरा है
थकान को पराजित करती आवाजों में
एक आवाज़ मेरी भी है शामिल
और बेमक़सद कभी नहीं होती आवाजें...
निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है उसे फेंकने वाला हाथ नहीं
निष्पक्ष कागज हो सकता है कलम के लिए कहाँ मुमकिन है यह?
मैं हाड़-मांस का जीवित मनुष्य हूँ
इतिहास और भविष्य के इस पुल पर खड़ा
नहीं गुज़ार सकता अपनी उम्र
नियति है मेरी चलना
और मैं पूरी ताक़त के साथ चलता हूँ भविष्य की ओर
— अशोक कुमार पाण्डेय
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हिन्दी दिवस बीता है, लेकिन यह क़िस्सा सुन लीजिए।
कोपनहेगन में था। बारिश हो रही थी और नक़्शे में रेलवे स्टेशन पास ही कहीं दिखा रहा था पर समझ नहीं आ रहा था। एक भारतीय दिखने वाला नवयुवक दिखा। अंग्रेज़ी में पूछा, उसने अंग्रेज़ी में बताया और मुस्कुराकर पूछा- You are here for the first time?
मैंने हाँ की मुद्रा में सर हिलाकर उससे पूछा- Are you Indian? उसने मुस्कुराकर सर हिलाया तो मैंने हिन्दी में कुछ कहा। उसने अंग्रेज़ी में कहा कि मैं तमिलनाडु से हूँ और मुझे ठीक से हिन्दी नहीं आती। मैंने अंग्रेज़ी में ही उससे कहा कि मुझे तमिल तो एकदम नहीं आती। दोनों मुस्कुराये और विदा ली।
तो बस याद रखना चाहिए कि जिन्हें हिंदी नहीं आती वह भी भारतीय हैं। राष्ट्रभाषा का गर्व इस तथ्य पर राख डालने के लिए नहीं करना चाहिए।
— अशोक कुमार पाण्डेय
कोपनहेगन में था। बारिश हो रही थी और नक़्शे में रेलवे स्टेशन पास ही कहीं दिखा रहा था पर समझ नहीं आ रहा था। एक भारतीय दिखने वाला नवयुवक दिखा। अंग्रेज़ी में पूछा, उसने अंग्रेज़ी में बताया और मुस्कुराकर पूछा- You are here for the first time?
मैंने हाँ की मुद्रा में सर हिलाकर उससे पूछा- Are you Indian? उसने मुस्कुराकर सर हिलाया तो मैंने हिन्दी में कुछ कहा। उसने अंग्रेज़ी में कहा कि मैं तमिलनाडु से हूँ और मुझे ठीक से हिन्दी नहीं आती। मैंने अंग्रेज़ी में ही उससे कहा कि मुझे तमिल तो एकदम नहीं आती। दोनों मुस्कुराये और विदा ली।
तो बस याद रखना चाहिए कि जिन्हें हिंदी नहीं आती वह भी भारतीय हैं। राष्ट्रभाषा का गर्व इस तथ्य पर राख डालने के लिए नहीं करना चाहिए।
— अशोक कुमार पाण्डेय
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Samkalin Hastakshep (March 2023).pdf
19.4 MB
समकालीन हस्तक्षेप (मार्च 2023)
Samkalin Hastakshep (April 2023).pdf
19.2 MB
समकालीन हस्तक्षेप (अप्रैल 2023)
Samkalin Hastakshep (June, 2023).pdf
24.1 MB
समकालीन हस्तक्षेप (जून 2023)
Hastakshep Vol. 17, Issue 1, July-September, 2023.pdf
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समकालीन हस्तक्षेप (जुलाई-सितंबर 2023)
Samkalin Hastakshep 17 (2).pdf
32 MB
समकालीन हस्तक्षेप (अक्टूबर-दिसंबर 2023)
Samkalin Hastakshep 17(3).pdf
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समकालीन हस्तक्षेप (जनवरी-मार्च 2024)
समकालीन हस्तक्षेप 17 (4).pdf
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समकालीन हस्तक्षेप (अप्रैल-जून 2024)
समकालीन हस्तक्षेप 18 (1).pdf
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समकालीन हस्तक्षेप (जुलाई-सितंबर 2024)
ac28a5a1-f425-4a1d-91cb-c7a57ea7d40b.pdf
395.5 KB
UGC का पीयर-रिव्यूड जर्नल पर नया नोटिफिकेशन और दिशानिर्देश की प्रति।
Hastakshep 19 [1].pdf
58.6 MB
समकालीन हस्तक्षेप (जुलाई-सितंबर 2025)